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Thursday, April 28, 2011

हे ! भारत तुम कहाँ हो !


क्या भारत सिर्फ एक बाजार है ? जहां पर खरीदने और बेचने वाले लोगों का बोलबाला है और क्या यहां सिर्फ पैसा ही पूजा जाता है ? और चूंकि बाजार का उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है इसलिये वह किसी भी नियम, नीति और अनीति को नहीं मानता। इसलिये वहां की राज्यसत्ता को देश के आत्मिक संस्कार नहीं बाजार के दलाल संचालित करते हैं। या भारत का कोई सांस्कृतिक अतीत भी है, जो भारत की विद्वता, संस्कार, आत्मिक चेतना, आध्यात्मिक उर्जा और उन सबसे अलग जीवन दर्शन के लिए विश्व में विख्यात था, लेकिन हमारे शासकों की अकर्मण्यता ने भारत के चैतन्यमयी और संस्कारी स्वरूप को नष्ट कर एक बाजार बना दिया।

आश्चर्य तो तब होता है जब देश के राजनेता विदेशों में जाकर अपने देश के संस्कारों की बात नहीं करते, अपने देश की उर्जा और उसकी ताकत की बात नहीं करते, हमारे उच्च मानवीय मूल्यों की बात नहीं करते,अपितु वे बात करते हैं तो ये बताते हैं कि वे कहां और क्या बेच सकते हैं या वे कितना बिक चुके हैं और कितना बिकना बाकी हैं। वे अपने देश को बाजार बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। और यही मानसिकता है जो भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार को संरक्षित और पल्लवित करती है।

भारत में जैसे जैसे भ्रष्टाचार का मुद्दा गर्माता जा रहा है,राजनेताओं की छिछालेदार सामने आ रही है, आश्चर्य तो तब होता है जब भारत की राजनीति के प्रेम चौपड़ा कांग्रेस महामंत्री दिग्विजय सिंह हर उस व्यक्ति के कपडे उतारने लग जाते हैं , जो भी भ्रष्टाचार के विरूद्ध अपनी आवाज उठाता है और पूरी कांग्रेस पार्टी में एक भी ऐसा नेता नहीं है जो उनसे कहे कि वे अपना अर्नगल प्रलाप बंद करें। तो क्या यह नहीं माना जाना चाहिये कि दिग्विजय सिंह 10, जनपथ के इशारे पर ये सब हरकतें कर रहे हैं। समझ में नहीं आता कि वे किसके सामने अपनी निष्ठां दिखाना चाहते हैं. सोनिया गाँधी के प्रति या भारत के प्रति।

भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही है कि हम सिर्फ संकटों के समय में ही एकजुटता दिखा पाये हैं। भारत का नागरिक देश के मान अपमान को राजाओं का विषय मानता आया है। इन्हीं कुछ राजाओं के कारण भारत सिकुड़ता चला गया। नोबल पुरूस्कार प्राप्त सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री वी एस नायपाल ने अपनी पुस्तक ’भारत – एक आहत सभ्यता‘ में हमारे राष्ट्रीय चरित्र की व्याख्या करते हुए लिखा है कि ’’कहा जाता है कि सत्रह वर्ष के एक बालक ने नेतृत्व में अरबों ने सिंध के भारतीय राज्य को रौंदा था, उस अरब आक्रमण के बाद से भारत सिमट गया है। अन्य कोई सभ्यता ऐसी नहीं, जिसने बाहरी दुनिया से निपटने के लिए इतनी कम तैयारी रखी हो। कोई अन्य देश इतनी आसानी से हमले और लूटपाट का शिकार नहीं हुआ। शायद ही ऐसा कोई और देश होगा, जिसने अपनी बर्बादियों से इतना कम (सबक) सीखा होगा।‘‘ श्री वी एस नायपाल को साहित्य के लिए 2001 में नोबल पुरूस्कार प्रदान किया गया था। उनके पुरूखे भारत से गिरमिटिया मजदूर की तरह त्रिनिदाद चले गये थे । श्री नायपाल को उनके त्रिनिदाद का नागरिक होने पर गर्व भी है। लेकिन वे अपने पुरूखों की मातृभूमि के रखवालों की मानसिकता से पेरशान हैं। श्री नॉयपाल ने साबित कर दिया कि यही वो कारण है कि हमने अपने मान सम्मान को भारत के मान अपमान से ज्यादा बड़ा समझा ।

आज स्थिती यह है कि हमारे राजनेता, जो कोई भारत के मान सम्मान के लिए बोलता है, उसे सांप्रदायिक कहने और साबित करने में पल भर की भी देरी नहीं लगाते। इसी कारण आज कश्मीर में पाकिस्तान के हौंसले बुलंद है। इसी कारण 15 अगस्त 1947 को प्राप्त बंटे हुए भूभाग में से एक लाख वर्ग किलोमीटर मातृभूमि को पाकिस्तान और चीन दबाये बैठे हैं। इसे समझे जाने की जरूरत है कि आज हम जिस भारत को दुनिया के मानचित्र पर देखते हैं, सिर्फ वही भू भाग भारत नहीं है। वर्तमान ईरान (जिसे पहले आर्यन कहा जाता था ) से लेकर सुमात्रा, बाली इंडोनेशिया तक के द्वीप भारत की विशालता की कहानी कहते हैं। हजार सालों के विदेशी आक्रमण के बाद भारत बंटता चला गया और हमारे देश का राजनीतिक नेतृत्व अपने स्वार्थ और सत्ता के दंभ में भारत को एक नहीं रख पाया और स्थिति आज यहां तक है कि कश्मीर के जिस हिस्से को हम अपने मानचित्र में दर्शाते हैं, वहां भारत की सेना भी नहीं जा सकती, आम भारतीय के जाने की बात तो बहुत दूर है। हमारे शासक उस एक एक इंच मातृभूमि को वापस लाने की बात तक नहीं करते।

आज भी भारत के शासक अपने इस झूठे दंभ और अहंकारी मानसिकता से बाहर नहीं आ पाये हैं। इसी कारण हम तिल तिल कर मारी जा रही मातृभूमि के दैवीय स्वरूप को स्वीकार नहीं करते, अपितु इसे सिर्फ एक बाजार के रूप में ही देखते हैं। प्रश्न उठता है कि यदि भारत एक बाजार है, तो इसके नागरिक क्या हैं ? क्या भारत के नीति नियंताओं को यह भी समझाना पडेगा कि मातृभूमि और मां में बाजार नहीं संस्कार देखे जाते हैं। ये बात तो विदेशी मूल की सोनिया गांधी भी समझती हैं, पर हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री पी चिदंबरम, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और उनके भौंपू दिग्विजय सिंह, अभिषेक मनु सिंघवी और मनीष तिवारी को क्यों समझ नहीं आती?

इसका कारण है हमारी तथाकथित शिक्षा। जिसने हमें हमारी अस्मिता से विलग कर दिया है। ब्रिटिश शिक्षा शास्त्री और राजनेता लार्ड मैकाले की भविष्यवाणी सही साबित हुई। आज से लगभग 175 साल पहले भारत का वर्णन करते हुए लार्ड मैकाले ने 2 फरवरी1835 को ब्रिटिश संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि ’’ मैंने भारत की सभी जगह देखी हैं, मैंने इस यात्रा के दौरान एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा जो भीख मांगता हो या चोर हो। उनके चरित्र बहुत उज्जवल हैं, वे बहुत योग्य और कर्मठ हैं। यही उनकी संपदा है। मुझे नहीं लगता कि हम इस देश को कभी जीत पायेंगें, जब तक कि हम इस देश के मेरूदण्ड़ को ना तोड़ दें, जो कि इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ताकत है। और इसलिये मैं उनके सांस्कृतिक, पुरातन और प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को बदलने का प्रस्ताव रखता हूं । यदि भारतीय यह सोचने लग जाएं कि जो विदेशी और इंग्लिश है वह ही अच्छा है, और उनकी संस्कृति से बेहतर है तो वे अपनी आत्मिक उर्जा और अपनी परंपराओं को खो देंगें और तब वे वैसे बन जाएंगें जैसा कि हम चाहते हैं।‘‘

लार्ड मैकाले ने मात्र 175 सालों में वो कर दिखाया जो अनेको हमले और हजारों साल की गुलामी भारत को ना कर सकी। सांस्कृतिक और आत्मिक चेतना से परिपूर्ण भारत की जगह एक बाजार ने ले ली है। विडम्बना यह है कि जिन सपूतों को मां के आंचल की रक्षा करनी चाहिये, वे उसके आंचल को उघाड़ कर उसमें बाजार ढूंढ़ रहे हैं। तो जब बाजार ही मां के आंचल की बोली लगायेगा, तो पड़ोसी के घर भले ही चूल्हा ना जले, पर अपनी शाम रंगीन होगीं हीं और भारतमाता का एक पुत्र दूसरे पुत्र की मदद करने की एवज में रिश्वत मांगें तो उसमें कैसा आश्चर्य? हे भारत तुम कहां हो, जिसकी रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने जान की बाजी लगा दी थी।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।

Saturday, April 16, 2011

जवाब राजनेताओं को देना है

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सहसा यह विश्वास ही नहीं होता कि आजाद भारत के राजनेता किस दुस्साहस के साथ जनता द्वारा उठाये गये मुद्दों को नकारने में लगे हैं। क्या भ्रष्टाचार के समर्थन या विरोध के बारे में भी कोई दो राय भी हो सकती हैं ? यह साफ साफ समझे जाने की आवश्यकता है कि भारत की जनता के लिये ना तो बाबा रामदेव महत्वपूर्ण हैं और ना ही अन्ना हजारे। उसके लिये महत्व इस बात का है कि वह तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी है और यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मुद्दे पर अपने पद को छोड़कर जनता के आव्हान में शामिल होते हैं तो भारत की जनता उन्हैं भी बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की तरह अपनी पलकों पर बिठा लेगी। अब यह तय मनमोहन सिंह को करना है कि उनमें अपनी ईमानदारी को साबित करने का दम है भी या नहीं।
केन्द्र सरकार जिस प्रकार से भ्रष्टाचार को नकार रही है, उसके लिये भ्रष्टाचार का जीता जागता उदाहरण आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व0 वाई0 एस0 आर0 रेड्डी के पुत्र जगनमोहन रेड्डी ने प्रस्तुत किया है। आगामी 8 मई को कड्डपा लोकसभा क्षेत्र के लिये होने वाले उपचुनावों के लिए जगनमोहन रेड्डी ने निर्वाचन आयोग को अपनी संपत्ति 365 करोड़ रूपये बताई है, जबकि 2009 में जब उन्होंने निर्वाचन आयोग को अपनी संपत्ति मात्र 77 करोड़ रूपये बताई थी। मात्र 23 महिनों में ही उनकी संपत्ति 5 गुना तक बढ़ गई । यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि स्व0 वाई0 एस0 आर0 रेड्डी कांग्रेस सरकार के ना केवल मुख्यमंत्री थे, बल्कि कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के विश्वासपात्रों में से भी एक थे। उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद उनके पुत्र को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नहीं बनाया इसीलिये उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर नइ पार्टी बना ली। इसके विपरीत दूसरी तरफ भारत के संभ्रांत नागरिक हैं जिनके द्वारा दिये गए आयकर से भारत सरकार को अब तक की सबसे बड़ी आय हुई है। हाल ही में एक समाचार ये भी आया है कि भारत सरकार को इस बार आयकर के रूप में 456 लाख करोड़ रूपयों की आमदनी हुई है। प्रश्न यह है कि भारत का रहने वाला नागरिक क्या इसलिये कर चुकाता है कि वह पैसा देश के विकास की बजाय इन नेताओं की जेबों में जाये।
दरअसल, भारत के राजनेताओं ने चुनावों को अपनी सुरक्षा का हथियार बना लिया है। ये लोग पैसे के बल पर ही सत्ता प्राप्त करते हैं, और सत्ता में आने के बाद वही पैसा कमाने के लिए लोकतंत्र की कमियों का फायदा उठाते हैं। प्रश्न यह भी है कि क्या लोकतंत्र का अर्थ जनता की आवाज को अनसुना करना ही होता है, क्या चुनावों का उत्सव इसलिये मनाया जाता है कि देश को जाति, वर्ग , भाषा में बांटकर सत्ता सुख की प्राप्ति की जा सके, और जिन मतदाताओं ने राजनीतिक दलों को सत्ता चलाने का अधिकार दिया है, उनकी आवाज को घोंट दिया जाए। आखिर वो कौनसी शिक्षा है जिसके चलते जो भी व्यक्ति जनप्रतिनिधि निर्वाचित हो जाता है, वह सदन में पहुंचते ही जनता के मुद्दों को गौण समझने लगता है और सत्ता को सर्वोच्च । आखिर कैसे जनप्रतिनिधियों को सदन में पहुँचते ही यह विशिष्ट योग्यता हासिल हो जाती है कि वे जनता की मांगों को शासक की अवज्ञा के रूप में लेने के लिये स्वतंत्र हो जाते हैं और शासन के प्रति अवज्ञा को कुचलने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन राजनेताओं ने लोकतंत्र जैसे वरदान को अभिशाप में बदल दिया है, इसी कारण नागरिकों का एक बड़ा वर्ग मतदान के प्रति अरूचि व्यक्त करने लगा है।
पहले बाबा रामदेव और अब अन्ना हजारे को भ्रष्ट साबित करने में अपनी उर्जा को खपा रहे राजनीतिक दलों के राजनेता क्या यह साबित करना चाहते हैं कि जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलेगा, वे उस व्यक्ति को भी भ्रष्टाचार के दल दल में घसीट लेने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे । इसलिये जो भी व्यक्ति अपनी ईमानदारी को बचाकर रखना चाहते हैं वे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शब्द भी न बोलें। क्या यह माना जाए कि यह जनता को शासक वर्ग से मिल रही धमकी है ?
यह स्पष्ट रूप से समझे जाने की जरूरत है कि जो लोग अन्ना हजारे के समर्थन में सड़कों पर उतरे थे, वे केवल प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में शामिल करने की मांग पर नहीं आये थे। वे चाहते थे कि अन्ना हजारे भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों के खिलाफ होने वाले लोकतान्त्रिक आंदोलन के ठीक उसी प्रकार वाहक बनें जैसा कि जयप्रकाश नारायण ने 1975 में इंदिरा गांधी के अलोकतांत्रिक व्यवहार व सरकार के विरूद्ध किया था। लेकिन सत्ता में बैठे लोग अपने प्रभाव और पैसे के कारण भारत के नागरिकों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।
अच्छा तो यह होता कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का दंभ भरने वाले राजनेता भ्रष्टाचार पर देश भर में चल रही बहस को देखते हुए इस मुद्दे पर संसद में बात करते, और जनता को यह विश्वास दिलाते कि भारत के राजनीतिक दल भी भ्रष्टाचार को जड़मूल से समाप्त करने के लिए कृतसंकल्पित हैं। प्रश्न यह है कि क्यों नहीं इस विषय पर सभी राजनीतिक दल अपने मतदाताओं को विश्वास दिलाने के लिये आमराय बनाते कि वे सब उस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए संकल्पित हैं, जो भ्रष्टाचार की जननि है।
क्या वे इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि भारत के नागरिक अवज्ञा पर उतर जायें और सरकारों को सभी प्रकार के कर देने से मना कर दें। क्यों नहीं भारत के तमाम राजनेता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने का साहस दिखाते? या केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार पर एक श्वेत पत्र जारी करती जो भारत की जनता को यह बता सके कि सरकार की नजर में देश में भ्रष्टाचार की क्या स्थिति है ? या जनता को ही यह अधिकार देते कि वह अपने द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि को वापस भी बुला सकती है।
स्व0 प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी जब नए नए प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने यह कहने का साहस दिखाया था कि केन्द्र सरकार से चला एक रूपया गांव तक आते आते 15 पैसा रह जाता है, ये बात अलग है कि बाद में उन्हीं राजीव गांधी पर बोफोर्स तोप के सौदे में दलाली खाने का आरोप लगा। उसी तरह का साहस स्व0 राजीव की पत्नी श्रीमती सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में चलने वाली मनमोहन सिंह की सरकार क्यों नहीं कर पा रही है? प्रश्न यह भी महत्वपूर्ण है कि श्रीमती सोनिया गांधी की ऐसी कौनसी दुविधा है, जो उन्हैं अपने स्व0 पति की व्यथा को दूर करने से रोक रही है। क्या यह माना जाए कि उनके मार्गदर्शन में चलने वाली सरकारों में हो रहे भ्रष्टाचार को उनकी स्वीकृति प्राप्त है?
जरूरत इस बात की है कि विभिन्न राज्यों में सत्ता का सुख भोग रहे और भोग चुके राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के बारे में अपने मत को स्पष्ट करें, इस मुद्दे उनकी टालमटोल की नीति का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे भ्रष्टाचार का समर्थन करते हैं और आज के हालात में भ्रष्टाचार को अपरिहांर्य मानते हैं। हमें यह याद रखना होगा कि इस देश ने सदियों से अपने उपर हुए आक्रमणों को झेलकर भी अपने आप को बचाए रखा है और जब आक्रमण घर के भीतर से ही हो रहा हो तो जनप्रतिक्रिया कैसी होगी इसके लिए राजनेता भारत का इतिहास एक बार फिर पढ़ लें। अब जवाब राजनेताओं को देना है, देश की जनता उनके निर्णय का इंतजार कर रही है।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं)


Wednesday, April 6, 2011

भारत का भारत से संघर्ष

देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम चल पड़ी है। इस बार भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीविओं का एक बड़ा वर्ग चला रहा है। सुप्रसिद्ध समाज सेवी अन्ना हजारे ने भी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए गांधीवादी तरीके से आमरण अनशन की शुरूआत की है, और आश्चर्य इस बात का है कि देश -विदेश में इमानदार प्रधानमंत्री के रूप में पहचाने वाले मनमोहन सिंह ने अन्ना हजारे से अपील की है कि वो इस मुद्दे पर आमरण अनशन ना करें। क्या इसका अर्थ यह लगाया जाना चाहिये कि देश के प्रधानमंत्री नहीं चाहते कि भ्रष्टाचार भारत में मुद्दा बनें, और यह भी कि वे कौन लोग हैं जिनको भ्रष्टाचार के मुद्दा बन जाने से अपने अस्तित्व पर संकट खड़ा होता नजर आ रहा है?
दरअसल, आजादी के बाद से ही शासन व्यवस्था को संभालने वाले अंग्रेंजों के हिन्दुस्तानी उत्तराधिकारियों ने भारत की जनता को शासक और शासित की मानसिकता से ही देखा और सत्ता का इस्तेमाल अपनी विपन्नता को सम्पन्नता में बदलने के लिए एक हथियार के रूप में किया। इन राजनेताओं ने स्वाधीनता सैनानियों के संघर्षो और बलिदानों के साथ ना केवल विश्वासघात किया अपितु भारत की उस बेबस जनता के विश्वास को भी छला जो इनसे आत्मगौरव और स्वाभिमान से युक्त भारत की संकल्पना सजाए बैठे थे। आज हालात यह हैं कि ये राजनेता सत्ता की प्राप्ति के लिए देश के मतदाताओं को ही खरीदने का दुस्साहस करने लगे हैं। अभी जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं, वहां के राजनीतिक दल शराब से लेकर टी वी फ्रिज तक देकर वोटों को खरीदने का ना केवल दुस्साहस कर रहे हैं अपितु अपने इस अपराध में एक हद तक वे सफल भी हो रहे हैं।
इसी कारण पिछले कई सालों से भारत की प्रशासनिक एवं राजनीतिक व्यवस्था को भ्रष्टाचार की दीमक लग चुकी है और भ्रष्टाचार के विरूद्ध आम आदमी में ना केवल गहरी पीड़ा है, अपितु वह मन से आहत भी है। आजादी के बाद बनी पहली सरकार में ही भ्रष्टाचार की बू आने लग गई थी, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ तब के राजनेताओं की चुप्पी और अनदेखी ने हालात को इतना बिगाड़ दिया कि आज पूरा देश भ्रष्टाचारियों से संत्रस्त है। किसी को यह विश्वास नहीं है कि भारत का प्रशासनिक, न्यायिक और राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार से मुक्ती की अभिलाषा भी रखता है और इस अविश्वास के पीछे एक ठोस कारण भी है कि भारत की सरकारें आज तक यह सुनिश्चित नहीं कर पाई हैं कि भ्रष्टाचाररियों के लिए सत्ता के प्रतिष्ठानों में कोई भी स्थान नहीं है।
२०१० में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक सर्वे हुआ, ट्रांसपिरेसीं इन्टरनेशनल द्वारा विश्व के १७८ देशो में किये गये इस सर्वे में भारत को ८७ वें स्थान पर पाया गया और इसी संस्था ने यह भी दावा किया कि भारत विश्व के भ्रष्टतम देशो में से एक है। यहां तक कि दक्षिणी एशियाई देशो में भी भारत अपने पड़ोसी देशो (पाकिस्तान -143, बंगलादेश -134, नेपाल-146 और श्रीलंका - 92) से भ्रष्टाचार में बहुत आगे है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक तथ्य और क्या हो सकता है।
एक अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थान इन्टरनेशनल वाच डाग ने अपने अध्ययन में यह पाया है कि 1948 से 2008 तक के 60 सालों में 462 बिलीयन डालर यानी 20 लाख करोड़ से ज्यादा रूपये गैर कानूनी तरीके से भारत के बाहर ले जाए गए। यह राशि भारत के सकल घरेलु उत्पाद का 40 प्रतिशत है। और जिस 2 जी घोटाले को लेकर उच्चतम न्यायालय ने सरकार की नकेल कस रखी है, उससे यह राशि 12 गुना अधिक है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में आर्थिक विशेषज्ञ रहे श्री देव कार के अनुसार 11.5 प्रतिशत की दर से हमारे खून पसीने की कमाई को विदेशी बैंकों में जमा किया जा रहा है। तभी तो स्विस बैंक यह कहते हैं 1456 बिलियन डालर के साथ भारतीयों की
सर्वाधिक मुद्रा उनके बैंकों में जमा है। यह धन भारत पर कर्जे का 13गुना है। इन सब तथ्यों में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विदेशी बैंकों में जमा इस काले धन का 50 प्रतिशत हिस्सा 1991 में लागू किये गए आर्थिक सुधारों के बाद ही इन बैंकों में पहुंचा, और यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे वर्तमान इमानदार प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ही उस समय वित्त मंत्री के रूप में भारत को अंतर्राष्ट्रीय बाजार बना रहे थे।
देश के प्रति अपराधों की श्रृंखला सिर्फ यहां ही नहीं थम रही है, पीढ़ियों से सत्ता पर काबिज राजनीतिक परिवारों में से एक गांधी परिवार, तमिलनाडू के करूणानिधि या जयललिता, आंध्रप्रदेश के चंद्र बाबू नायडू या स्व. मुख्यमंत्री वाइ एस आर रेड्डी, कर्णाटक के मुख्यमंत्री एस येडडूरप्पा, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान खाद्य मंत्री शरद पवार, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती, पूर्व मुख्यमंत्री व घोषित समाजवादी मुलायम सिंह और लालू यादव, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और जम्मू कश्मीर का अब्दुल्ला परिवार ऐसे राजनीतिक परिवारों के रूप में उभरे हैं, जिनकी काली कमाइयो के चर्चे उनके ही दलों के राजनीतिक कार्यकर्ता बड़े ही दंभ के साथ करते हैं, और भारत के लोकतंत्र की यह मजबूरी है कि बिना इन राजनीतिक दलों के सहयोग और सत्ता बंटवारे के कोई भी राजनीतिक दल सरकारें नहीं बना सकता। चाहे वो बोफोर्स खरीदने के मामले में राजीव गांधी को चुनौती देने वाले स्व० विश्वनाथ प्रताप सिंह हों या देश के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी।
यह भ्रष्टाचार ही तो है कि आजादी के बाद से खरबों रूपये खर्च होने के बावजूद भारत के ग्राम अपनी किस्मत और बदहाली को बदल नहीं पाये हैं। वे पेयजल, सड़क, विद्यालय और चिकित्सालय जैसी आधारभूत सुविधाओं से भी वंचित हैं। देश के विकास में अपना श्रम पसीने की तरह बहा देने वाले मजदूर और किसान बी पी एल कार्ड में नाम लिखवाने के लिए संघर्षरत हैं। मध्यभारत के वनवासियों को विदेशी शक्तियां बंदूकें देकर भारत में ही आंतरिक संघर्षो को बढ़ावा दे रही हैं।
तो आज जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का आगाज हो रहा है, तो यह भारत की उसके विदेशी शत्रुओं से लड़ाई नहीं है, यह भारत का भारत के प्रति संघर्ष है। जहां अमीरों की संख्या जिस गति से बढ़ रही है, उतनी ही गति से किसान आत्महत्या कर रहे हैं, देश के 40 करोड़ लोगों को दो समय का निवाला नहीं मिल रहा है, विद्यालयों में जाने वाले छात्रों का प्रतिशत घट रहा है। भारत का प्रतिनिधित्व ऐसे लोगों के हाथों में है जिनके बदन भले ही मंहगी सिल्क के कपड़ों से ढ़के हैं, और उनकी सूरत समृद्ध भारत की चमक तो देती है, पर सीरत से वे ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जो बाजार है और यहां पर वही जीवित बचेगा, जिसके पास पैसे हैं चाहे वह हसन अली हो या गांधी परिवार।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।)

Sunday, March 27, 2011

उजली सूरतों का सच

पिछले दिनों विकीलीक्स द्वारा किये गए दो खुलासों ने भारतीयों को चिंता में डाल दिया है, इनमें एक खुलासा तो भारत के गृहमंत्री श्री पी चिदंबरम का अमरीकी राजदूत टिमोथी रोमर के मध्य हुई बातचीत का है, जिसमें पी चिदंबरम ने रोमर को कहा कि ’अगर भारत में पश्चिमी और दक्षिणी भाग ही होते तो भारत और ज्यादा समृद्ध होता‘। जिसका सीधा सा मतलब यह है कि हमारे गृह मंत्री भारत के अन्य भागों को पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों पर भार समझते हैं और वे संविधान की मूल भावना के अनुसार भारत की ’एकता और अखण्ड़ता को बनाए रखने की शपथ’ में कोई यकीन ही नहीं रखते, और विकास और समृद्धी के नाम पर ही सही यदि भारत को विभाजित किया जाए तो उन्हैं कोई आपत्ति नहीं है।
और दूसरा खुलासा राज्य सभा में विपक्ष के नेता श्री अरूण जेतली की अमरीकी राजनायिक राबर्ट ब्लैक से हुई बातचीत है, जिसमें जेतली ने ब्लैक से कहा कि ’भारतीय जनता पार्टी के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद एक अवसरवादी मुद्दा है। ‘जेतली का यह कहना दो संदेहों को जन्म देता है कि या तो जेतली, आज भी भारतीय जनता पार्टी के जन्म और उसके विकास यात्रा के सिद्धांत से अनभिज्ञ हैं या वे भारतीय जनता पार्टी को, उसके मातृ संगठनों को, उसके विचारों, सिद्धांतों और लाखों कार्यकर्ताओं को अपना गिरमिटिया मजदूर समझते हैं, जो उनकी कही हर बात का समर्थन करने को मजबूर हैं।
ये दोनों ही नेता भारतीय राजनीति में संभावना वाले राजनीतिज्ञ माने जाते हैं और दोनो ही नेताओं के लिए उनके दलों में यह माना जाता है कि वे भारत के प्रधानमंत्री होने की योग्यता रखते हैं। इसीलिए दोनों ही दल उन्हैं महत्व देते आये हैं और अपने दलों में प्राप्त इस महत्व के कारण ही उनका विदेशी राजनायिकों से मिलना जुलना लगा रहता है। जिससे वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को बना सकें। बंद कमरों में हुई इस बातचीत के सार्वजनिक हो जाने से इन दोनों ही नेताओं की ’ योग्यता‘ और सोच सामने आ गई है। इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलु यह है कि दोनों ही राजनेता भारत के दो प्रमुख दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी इन बातों का उनके दलों के नीति और सिद्धांतों से मेल नहीं खाते।
पहला प्रश्न तो गृह मंत्री चिदंबरम से यह ही है कि क्या वे मानते हैं कि भारत में विभाजन की अभी और भी संभावनाएं हैं? और दूसरा यह कि उनके लिए भारत का मतलब क्या है? और यह भी कि उनके लिए देश का कौनसा हिस्सा भारत है? और उत्तर और पूर्वोत्तर भारत को और वहां के मतदाताओं को वे क्या मानते हैं? और यदि वे भारत के वर्तमान सांगठनिक स्वरूप को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, तो फिर वे असम से राज्यसभा में आनेवाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रीमंडल में मंत्री ही क्यों हैं? और आखिर ऐसी कौनसी मजबूरी है, जिसके चलते उत्तर प्रदेश से चुनकर आनेवाले सोनिया गांधी और राहुल गांधी से निर्देशित हो रहे हैं? इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सरदार पटेल की विरासत एक ऐसा ’पढ़ा लिखा और विद्वान’ वकील संभाल रहा है, जिसको ना तो भारत की सांस्कृतिक विरासत की समझ है और ना ही उन्हें भारत की एकात्मता से ही कोई लेना देना है ।
क्या चिदंबरम को यह याद दिलाना पडे़गा कि दक्षिण भारत से ही आने वाले शंकर ने भारतवर्ष की संस्कृति, चेतना, और एकात्मता को देखते हुए पूरे भारत में चार शंकर पीठों की स्थापना कर वेदों को पुनर्स्थापित किया था, जिसके कारण उन्हैं आदिगुरू शंकराचार्य की उपाधि से विभूषित किया गया। क्या चिदंबरम को यह भी याद दिलाने की आवश्यकता है कि आज वे जिस मंत्रालय को संभाल रहे हैं, उस मंत्रालय को आजाद भारत में सरदार पटेल ने सबसे पहले संभाला था और उन्होंने अंग्रेजों की कूटनीति के उलट रियासतों में बंटे भारत को एक मजबूत गणतांत्रिक देश के रूप में विश्व पटल पर खड़ा कर दिया। बस एक ही जगह वे उस समय के चिदंबरम जैसे ’पढे़ लिखे और विद्वान’ राजनेता पं. जवाहर लाल नेहरू की बातों में आ गये और जम्मू कश्मीर रियासत के विलय का मामला उन्होंने पं. नेहरू पर छोड़ दिया।
और आज आजादी के 62 सालों के बाद भी जम्मू कश्मीर हमारे लिए एक समस्या बना हुआ है और अब तक हम उस पर एक लाख करोड़ रूपये से ज्यादा खर्च कर चुके हैं, इसके अलावा कितने ही सैनिक, जवान और नागरिक इसको भारत में बनाए रखने के लिए शहीद हुए हैं इसका जवाब गृहमंत्री श्री चिदंबरम के पास भी नहीं होगा।
चिदंबरम का यह विचार इसलिए भी भारत के प्रति देशद्रोह की श्रेणी में आता है कि जो व्यक्ति भारत के गृह मंत्री के रूप में काम कर रहा है, उसकी व्यक्तिगत सोच इस प्रकार की है। यह निर्णय कांग्रेस पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं को करना है कि वे चिदंबरम जैसे स्तरहीन और पृथकतावादी सोच के व्यक्ति को और कितने दिन तक ढ़ोते हैं। रहा, भारत की जनता का सवाल, वो तो चिदंबरम जैसे लोगों को चुनकर गलती कर चुकी है लेकिन वक्त आने पर इस गलती को वह सुधार भी सकती है।
दूसरी ओर राज्यसभा मे विपक्ष के नेता श्री अरूण जेतली हैं, जिन्होंने अपनी बातचीत में भारत की हिन्दू राष्ट्रवाद की चिंतन परंपरा को ही खारिज कर दिया है । क्या जेतली को यह याद दिलाने की जरूरत है कि भारतीय जनता पार्टी का जन्म ही हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांत और दोहरी सदस्यता के सवाल पर हुआ है। और क्या वे यह भी साबित करना चाहते हैं कि वे राष्ट्रवाद की राजनीति के ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जहां पर उनके बिना राष्ट्रवादी राजनीति एक कदम भी नहीं चल सकती। क्या अरूण जेतली यह कहने की ताकत रखते हैं कि वे अपने इस विचार पर मरते दम तक कायम हैं और इस मुद्दे पर होने वाले चुनावों में नगरपालिका चुनाव भी जीत सकते हैं, आम चुनावों की बात तो बहुत दूर की रही। अरूण जेतली का ’ज्ञान और विद्वता’ उनके पेशे के लिए भले ही सार्थक हो परन्तु राष्ट्रवादी राजनीति के लिए उनका यह ’ज्ञान’ मानसिक विक्षिप्तता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। जो लोग भारतीय जनता पार्टी की राजनीति करते हैं, उन्हैं बलराज मधोक का उदाहरण याद रखना चाहिये, जो लोकप्रियता के शिखर पर होने के बावजूद इसलिये हाशिये पर डाल दिये गए, क्योंकि उन्होंने अपने आप को जनसंघ द्वारा स्थापित राजनीतिक सिद्धांत से उपर मान लिया था।
भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम और राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली की अमरीकी राजनायिकों के साथ हुई बातचीत के खुलासे तो कम से कम यह ही साबित करते हैं कि देश की बागडोर ईमानदार राजनेताओं के हाथों में नहीं अपितु ऐसे नेताओं के हाथों में हैं, जो राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अपने देश के संविधान और कार्यकर्ताओं के अभिमान को किसी भी विदेशी ताकतों के आगे बेच सकते हैं। तो जब प्रश्न देश की अस्मिता का हो तो व्यक्ति का ज्ञान और विद्वता नहीं देखी जाती, सिर्फ यह देखा जाता है कि वह व्यक्ति अपने आप को देश के साथ कितना एकात्म कर पाया है और उसके मन में अपने देश और उसके संस्कारों के प्रति वो श्रद्धा है भी या नहीं जो प्राथमिक विद्यालय के प्रांगण में सिखाई जाती है।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।

Tuesday, March 15, 2011

क्या मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री हैं ?

जब जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दिखते हैं तो उनकी भाव भंगिमा देखकर एक ही प्रश्न परेशान करता है कि क्या मनमोहन सिंह अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, चीन के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ या फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस जरकोजी या रूसी राष्ट्रपति दिमित्र मेदेवदेव या इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड केमरुन जितने असरदार और चमकदार राजनेता हैं? और क्या विनम्र और धीमी आवाज वाले विद्वान मनमोहन सिंह कहीं से भी पूरे विश्व को और भारत के नागरिकों को भारत का प्रधानमंत्री होने का आभास दे पा रहे हैं हैं

प्रश्न यह भी है कि क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के स्वाभिमान का उत्कट और चमकता हुआ चेहरा हैं, और उसी तरह पूरे विश्व में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसा कि पूर्व में नेहरू, इंदिरा, राजीव, नरसिंहराव, चंद्रशेखर या अटलबिहारी वाजपेयी करते थे या मनमोहन सिंह किसी राज्य सरकार के मुख्य सचिव या ऐसे ही किसी नौकरशाह की तरह दिखते हैं, जिसकी जिम्मेदारी अपने बॉस के आदेशों को पूरा करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। चाहे देश की आवाज कुछ भी हो और बॉस कितना ही पथभ्रष्ट क्यों ना हो?

तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ खड़ा होता है कि भारत का प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिये? क्या हमें ऐसा प्रधानमंत्री चाहिये जो एक बार भी लोकसभा से चुनकर नहीं आया हो, और ना ही लोकसभा चुनाव लड़कर सदन में आने की इच्छा रखता हो। और यह भी कि वह व्यक्ति भारत के नागरिकों द्वारा चुनी गई लोकसभा का कभी सदस्य ही नहीं रहा और प्रधानमंत्री बनने के बावजूद उसने कभी लोकसभा में जाने और उसका नेतृत्व करने की चुनौती को स्वीकार नहीं किया। यह प्रश्न उस व्यक्ति के लिए आश्चर्यजनक लग सकता है जो विगत 7 सालों से देश के प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहा हो, और जरा यह भी सोचने की बात यह भी है कि इन 7 सालों में उस प्रधानमंत्री से जनता से सीधे संवाद के लिए कितनी जनसभाओं को संबोधित किया है?

क्या संविधान के निर्माताओं ने इसी दिन के लिए राज्यसभा की रचना की थी कि देश की बागडोर संभालने वाला व्यक्ति लोकसभा में आने के लिए निर्धारित चुनाव प्रक्रिया का पालन नहीं करे और संविधान में प्रदत्त इस छूट का इस्तेमाल पद पर बने रहने के लिए करे? यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी जगह सही हैं तो फिर प्रश्न यह भी उठता है कि नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक जितने भी प्रधानमंत्री इस देश में हुए हैं, उन्होंने लोकसभा का चुनाव ही क्यों लड़ा? क्या उनके लिए राज्यसभा में निर्वाचित होना दुरूह कार्य था?

1991 में नरसिंहराव मंत्री मंडल में वित्त मंत्री के रूप में शामिल हुए मनमोहन सिंह ने राज्यसभा के जरिये देश की सर्वोच्च नियामक संस्था संसद में प्रवेश किया। उनका पहला कार्यकाल 4 वर्ष के लिए था। उसके बाद से लेकर आज तक वे 3 बार संसद में पहुंचते रहे हैं और हर बार वे जनता द्वारा चुने जाने की अपेक्षा पार्टी के प्रतिनिधि बनकर राज्यसभा में ही पहुंचते हैं। तो क्या ये माना जाना चाहिये कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जवाबदेही देश की जनता के प्रति नहीं अपितु पार्टी के पदाधिकारियों के प्रति है, जो उनका राज्यसभा में जाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। क्या यह प्रश्न भी नहीं पूछा जाना चाहिये कि हमारे प्रधानमंत्री लोकसभा चुनावों से क्यों कतराते हैं? 1991 से लेकर आज तक 4 बार आम चुनाव हो चुके हैं और 1998 के लोकसभा चुनावों में नई दिल्ली से चुनाव लड़ने (जिसमें वे पराजित हो गये थे) के अलावा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कभी कोई और चुनाव लड़ने का प्रयास ही नहीं किया।

बात सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था के तहत एक पद को भरे जाने की नहीं है। यह प्रश्न सांस्कुतिक और भाषाई विविधता वाले दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र के नेतृत्व का है। यदि पद ही भरना होता तो सोनिया गांधी भी भर सकती थीं, लेकिन उनका विरोध राजनीतिक दलों ने इस आधार पर किया कि वे सम्पूर्ण विश्व में भारत का चेहरा नहीं हो सकती ? वे स्व0 राजीव गांधी की पत्नी हो सकती हैं लेकिन इंदिरा नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही ईमानदार और बुद्धिमान व्यक्ति की तरह जाने जाते हैं लेकिन वे भारत के गौरवशाली अतीत और उसके आत्म स्वाभिमान को प्रकट नहीं करते। उनकी छवि एक ऐसे प्रशासक के रूप में उभरकर सामने रही है जो बेबस और बेचारा है। जिसका इकबाल ना तो उसके मंत्री मंडलीय सहयोगी ही मानते हैं और ना ही उनका राजनीतिक दल। वे तो एक ऐसे बडे बाबू की तरह दिख रहे हैं जिनकी नाक के नीचे 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो जाता है, और वे कुछ नहीं कर पाते। एक मंत्री क्रिकेट मैच में अपनी हिस्सेदारी तय करता है और उन्हैं पता नहीं चलता, एक मंत्री अपनी गलत नीतियों के कारण महंगाई को बढ़ाकर मुनाफाखोरी को बढ़ावा दे रहा है और वे बेबस हैं। पूरा देश चीख चीख कर भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ सड़कों पर रहा है और वे मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर भ्रष्ट आचरण के दोषी व्यक्ति कोअज्ञानवश नियुक्त कर देते हैं।

वे पाकिस्तान के साथ परदे के पीछे ना जाने क्या बात करते हैं जिसका पता मंत्री मंडलीय सहयोगियों को भी नहीं होता है, विपक्ष की बात तो बहुत दूर की रही। वे कहने को तो सरकारी खजाने से एक रूपये का वेतन लेते हैं लेकिन उन्हीं के नेतृत्व में चल रही सरकार की अनियमितताओं पर वे कोई जवाब दे नहीं पाते।

इसलिये जब हम सांस्कृतिक और भाषाई विविधता और विशाल लोकतंत्र वाले भारत के नेतृत्व की बात करते हैं तो निश्चित ही सरदार मनमोहन सिंह बौने नजर आते हैं। स्वतंत्र भारत में इतना कमजोर प्रधानमंत्री कार्यालय उस समय भी नहीं हुआ, जब गुलजारी लाल नंदा, एच डी देवगौडा या इंद्र कुमार गुजराल मजबूरी में प्रधानमंत्री बनाए गए थे। हो सकता है कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बने रहने की कोई मजबूरी हो, यह भी संभव है कि उनकी पार्टी के नेताओं के पास मनमोहन सिंह से ज्यादा योग्य व्यक्ति इस पद के लिए ना हो, लेकिन भारत की 118 करोड़ की जनता ऐसे किसी भी व्यक्ति को प्रधानमंत्री के पद नहीं देखना चाहती जो बेबस और लाचार हो तथा उसको अपने हर कार्य की मंजूरी लेने के लिए एक नौकरशाह की तरह भाग दौड़ करनी पड़ती हो और वो जनता के प्रति अपनी जवाबदेही समझने की बजाय अपने बॉस के प्रति निष्ठां रखता हो .

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं)

Sunday, January 9, 2011

एक गुमनाम खबर से उपजते सवाल

बीते सप्ताह पाकिस्तान से एक खबर आई, खबर पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं के उत्पीड़न की थी, इसलिए उसको भारत के अखबारों में जगह नहीं मिली। उसको दफन होना ही था, क्योंकि उस खबर को प्रमुखता मिलती तो हमारे सेकुलर मीडियाकर्मियों के “सांप्रदायिक” हो जाने का खतरा था। दरअसल, भारत में ही हिन्दुओं के उत्पीडन की खबर को हमारे मीडिया मित्र खबर नहीं मानते, तो पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं की पुकार पर उनका ध्यान नहीं जाने पर अचरज कैसा?

यह खबर पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रीब्यून ने प्रकाशित की है। इस अखबार ने कहा है कि बलूचीस्तान में रहने वाले हिन्दु अल्पसंख्यकों की जान माल को खतरा बढ़ता जा रहा है और लगभग100 हिन्दू परिवारों ने वहां से पलायन कर दिया है। बलूचीस्तान के मस्तांग क्षेत्र के पांच हिन्दू परिवारों ने तो भारत में शरण भी ले ली है और अन्य हिन्दू परिवार भी अपनी जान बचाने के लिए भारत में शरण लेने के लिये प्रयासरत हैं। हकीकत यह है कि बलूचीस्तान के दक्षिणी पश्चिमी इलाके में पिछले साल 291हिन्दुओं का अपहरण किया गया है । बलूचीस्तान की राजधानी क्वेटा में ही पिछले साल 8 हिन्दुओं की हत्याओं का समाचार है। इन हिन्दुओं में वहां के प्रतिष्ठित व्यापारी और धर्माचार्य तक शामिल हैं। पिछले साल ही क्वेटा के प्रतिष्ठित व्यापारी जुहारी लाल का अपहरण हुआ और वो फिरौती की बड़ी रकम देकर ही छूटे।

सच्चाई यह है कि पाकिस्तान का प्रशासन हिन्दुओं के उत्पीड़न को मौन स्वीकृति प्रदान करता है। इसका खुलासा भी पाकिस्तान अल्पसंख्यक आयोग द्वारा 2003 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में हुआ। अल्पसंख्यक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मुस्लिम बस्तियों से निकलने वाली लड़कियों के साथ मुस्लिम लड़के अभद्र व्यवहार करते हैं। हिन्दू छात्राओं को मुस्लिम बनने के लिए बाध्य किया जाता है। उनका अपहरण कर लिया जाता है। प्रशासन की अनदेखी का सबसे ज्यादा फायदा वहां के मौलवी उठा रहे हैं, जो आये दिन मस्जिदों से हिन्दू धर्म स्थलों और संपन्न व्यापारियों के प्रतिष्ठानों को तोड़ने का फरमान जारी करते रहते हैं।

यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि 1947 में बलूचिस्तान में हिन्दुओं की आबादी २२ प्रतिशत थी। परन्तु अंग्रेजों ने बदनीयती के साथ 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान को एक देश के रुप में मान्यता देकर अलग कर दिया। इस विभाजन को लोर्ड माउण्टबेटन और जिन्ना ने हस्ताक्षर करके स्वीकार कर दिया था। जब यह विभाजन हो रहा था, तो सत्ता की लालसा में रणनीति बनाने में व्यस्त भारत के कांग्रेसी नेता अंग्रेजों की इस घातक कूटनीति के खिलाफ कुछ नहीं बोले। बाद में कश्मीर पर कब्जा करने में विफल रहने के बाद पाकिस्तान ने 1948 में बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया। तब से लेकर आज तक पाकिस्तान सरकार ने बलूचिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं और बलूची नागरिकों पर असंख्य अत्याचार किये हैं। पाकिस्तानी सेना के इन अत्याचारों से परेशान होकर वहां के युवा आंदोलन की राह पर हैं। जबकि हिन्दू बलूचिस्तान से पलायन करने को मजबूर हैं।

बलूचिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार की कहानी पुरानी है। वहां पर हिन्दुओं पर अत्याचार का आलम यह है कि मार्च 2005 में सुरक्षा बलों ने अंधाधुंध गोली चलाकर 33 हिन्दुओं की हत्याएं कर दी। पाकिस्तान सरकार की इस बर्बरतापूर्ण कार्यवाही के बाद बलूचिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं और सिखों में इतना भय बैठ गया कि वे अपनी जान बचाने के लिए पाकिस्तान से पलायन कर भारत आ गये। पिछले दिनों पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या का एक आंकड़ा प्रकाशित हुआ है। इसके अनुसार भारत के विभाजन के समय पाकिस्तान में 25 प्रतिशत हिन्दू थे, जो 2010 में 1.6 प्रतिशत रह गये हैं। अकेले बलूचिस्तान में हिन्दू 22 प्रतिशत से घटकर २ प्रतिशत रह गये हैं। पाकिस्तान ही क्यों यही हाल बंगलादेश में भी है। जहां 1971 में हिन्दुओं की संख्या 33 प्रतिशत थी और 2010 में यह 7 प्रतिशत ही रह गई ।

यह घटना कुछ प्रश्नों को जन्म देती है। यह सवाल हमारे और हमारे नेताओं की मानसिकता का प्रदर्शन करते हैं। सवाल यह है कि क्या भारत के संवेदनशील मीडिया का यह कर्तव्य नहीं था, कि वह पड़ोसी देशो में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों पर भारत के नागरिकों का ध्यान आकर्षित करता ? और क्या भारत सरकार ने इन परिस्थियों में अपने उत्तरदायित्व का उचित पालन किया? क्या भारत के नागरिकों ने पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू परिवारों की स्थिति-परिस्थिति को लेकर कभी अपनी चिंता प्रकट की?

दरअसल, हम सभी अंग्रेजों के चले जाने के बाद अपनी ‘आजादी’ में इतने डूब गये कि हमें अपने परिवार, अपने पड़ोस, अपने समाज और देश के बारे में चिंता करने की आवशयकता ही नहीं महसूस हुई । देश के विभाजन को स्वीकारने वाले नागरिकों ने उन देशो में रह गए हिन्दुओं की निर्मम हत्याओं का प्रतिवाद नहीं किया। इतना ही नहीं अपने ही देश में विस्थापित कर दिये गए कश्मीरियों के प्रति भी हमारी संवेदना जागृत नहीं हो सकी। हमारे ही बीच के प्रतिष्ठित साहित्यकार और राजनेता कश्मीर के भारत का अविभाज्य अंग होने पर सवाल खडे करते रहे और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र खामोश रहा ?

हकीकत यह है कि आजादी से लेकर आज तक भारत के पास सक्षम और सबल नेतृत्व का भारी अभाव रहा । एक श्रीमती इंदिरा गांधी को छोड़ दिया जाए, तो अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस या इंदिरा कांग्रेस ने एक भी ऐसा नेतृत्व इस देश के सामने नहीं रखा, जिसकी धाक को भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों ने स्वीकार किया हो।

यह वीरभूमि मां भारती का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि विगत बारह सौ वर्षो में इस भूमि से उपजने और पल्लवित होने वाली संस्कृति और सभ्यता को तिल तिल कर समाप्त किया जा रहा है और आज स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि हिन्दुओं के ही धर्मान्तरित वंशज इस्लाम के नाम पर भारत भारती का चीरहरण करने में गौरव महसूस करते हैं और राम, कृषण, महावीर,बुद्ध, विषणुगुप्त, चाणक्य के देश के निवासी असहाय और बेबस होकर सत्यमेव जयते की हत्या होते हुए देख रहे हैं।

आजाद भारत का लोकतान्त्रिक स्वरूप ही भारत माता के लिए अभिशाप के रूप में सामने आ रहा है, जहां भारत में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिनकी राष्ट्र के प्रति निष्ठां संदेहास्पद है और राजनीतिक दल राजनीतिक कारणों और सत्ता पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ऐसे नागरिकों और समाजों का सरंक्षण में लिप्त हैं । जरूरत इस बात की है भारतीय समाज अपनी मूर्छा को त्याग कर अपनी आंतरिक शक्ति का प्रकटन करे। भारतीय समाज का बलशाली होना भारत के लिए इतना जरूरी नहीं है, जितना की सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए है, क्योंकि पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति ही ऐसी एक मात्र संस्कृति है जो तमसो मां ज्योतिर्गमय और सत्यमेव जयते का उद्घोष करती है ।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

लेखक सेण्टर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं .

Monday, December 6, 2010

क्यों नहीं बनाई जा रही जे पी सी

पिछले दिनों से देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में कोई काम काज नहीं हो रहा है। विपक्ष की मांग है कि 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जांच के लिये जे पी सी बनाई जाए। परन्तु सरकार विपक्ष की इस मांग के आगे झुकने के लिए तैयार ही नहीं है। पूरा विपक्ष और उच्चतम न्यायालय सरकार से न्यायसंगत निर्णय लेने की अपेक्षा कर रहे हैं लेकिन सरकार यह पता लगाने की इच्छुक ही नहीं दिखती कि क्या वाकई में 2 जी स्पैक्ट्रम के आवंटन में दूर संचार मंत्रालय के मंत्री और अधिकारियों ने भ्रष्ट आचरण कर देश को एक लाख पचहत्तर हजार करोड रूपये़ के राजस्व का नुकसान पहुँचाया है?
यह याद रखे जाने की जरूरत है कि कांग्रेस ने अपना लोकसभा चुनाव ‘ कांग्रेस का हाथ- आम आदमी के साथ’ का नारा देकर जीता था। लेकिन इसी आम आदमी के लिए काम आने वाला सरकारी खजाना लुट गया और सरकार अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए विपक्ष और उच्चतम न्यायालय के अलावा आम आदमी की पुकार को भी अनसुना कर रही है। तो यह क्यों नहीं माना चाहिये कि कांग्रेस नीत संप्रग सरकार अपने मतदाता और देश के प्रति जवाबदेही और उत्तर दायित्व से भाग रही है? क्या सरकार में बैठे लोगों को सत्ता सुख को बनाये रखने के लिए देश के भाग्य और उसके हालात के साथ खेलने की पूरी छूट मिलनी चाहिये या केन्द्र सरकार के लिए भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है।
विपक्ष द्वारा जे पी सी की मांग करना और उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रधानमंत्री से जवाब की अपेक्षा करना साधारण घटना नहीं है। इसका मतलब यह है कि विपक्ष और न्यायालय दोनों का ही संप्रग सरकार की प्रशासनिक व्यवस्थाओं से भरोसा उठ गया है। इसलिये वे अपनी ‘निगरानी’ में तथ्यों का पता लगाना चाहते हैं। मुख्य सर्तकता आयुक्त थॉमस को इस पूरी जांच प्रक्रिया से अलग रहने के लिए कहना भी सरकार की पारदर्शिता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।
ऐसा पहली बार नहीं है कि विपक्ष ने सयुंक्त संसदीय जांच दल की मांग उठाई है। सबसे पहले बोफोर्स तोप घोटाले की जांच करने की मांग को लेकर 6 अगस्त 1987 को पहली जे पी सी का गठन हुआ था। तब स्व0 राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। उसके बाद स्व0 नरसिंह राव के कार्यकाल में हुए हर्षद मेहता घोटाले की जांच के लिए 6 अगस्त 1992 को स्व0 रामनिवास मिर्धा के नेतृत्व जे पी सी का गठन हुआ। वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व काल में भी 26 अप्रेल 2001 को शेयर मार्केट घोटाले के लिए ले0 जनरल प्रकाश मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता में तीसरी जे पी सी बनी और 2003 में शरद पवार के नेतृत्व में पेय पदार्थों में कीटनाशक की मिलावट को लेकर पिछली संप्रग सरकार ने जे पी सी का गठन किया। तब भी श्री मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री थे। लेकिन एक बोफोर्स वाले मामले के अलावा सरकार का इतना अडियल रूख कभी नहीं रहा। हालांकि ये सरकार पर है कि संयुक्त संसदीय जांच दल की रिपोर्ट और सलाह को माने या ना माने। क्योंकि यदि सरकार ने हर्षद मेहता और शेयर मार्केट घोटालों की रपटों और सुझावों पर ध्यान दिया होता तो 7 हजार करोड़ का सत्यम घोटाले को होने से रोका जा सकता था।
दरअसल, केन्द्र सरकार को नियंत्रित करने वाले नेता और दलाल इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि सरकार के अधीन चलने वाली किसी भी जांच एंजेसी को वे लोग प्रभावित करने की स्थिति में हैं। अतः 2 जी स्पैक्ट्रम की जांच में जिन नेताओं, दलालों, उद्योगपतियों और पत्रकारों की सांठ गांठ है उन्हैं और उनके भविष्य पर किसी प्रकार का संकट उपस्थित नहीं होगा, लेकिन यदि जे पी सी की मांग स्वीकारली जाती है तो आर्थिक घोटाले के इस पूरे तंत्र की बखिया उधेड़ी जा सकती है और कई ऐसे नाम भी सामने आ सकते हैं, जो अभी तक इस पूरे प्रकरण में पर्दे के पीछे हैं।
आश्चर्य तो तब होता है जब ईमानदारी, सज्जनता और सभ्यता की मिसाल माने जाने वाले प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह की बेचारगी सबके सामने आती है। देश पर जब भी आंतरिक या बाहरी संकट हो उस समय सक्षम और समर्थ नेतृत्व की जरूरत होती है, लेकिन इन राष्ट्रमंडल खेल हों या 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह एक कमजोर और लाचार प्रधानमंत्री साबित हुए हैं, जरूरत इस बात की है कि वे अपनी भूमिका में बदलाव लायें और निर्देश लेने की बजाय सरकार और पार्टी को निर्देशित करें।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।

Sunday, November 14, 2010

सोनिया गांधी से जवाब मांगते सवाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवर्तमान सरसंघचालक श्री कुपहल्ली सीतारमैया सुदर्शन द्वारा कांग्रेस और संप्रग की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी पर की गई टिप्पणियों से राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जब भी किसी व्यक्ति ने श्रीमति सोनिया गांधी के खिलाफ कुछ भी कहा है, तो कांग्रेस और उसमें पलने-बढ़ने वाले नेताओं ने हंगामा मचा दिया है। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि श्रीमति सोनिया गांधी के खिलाफ बोलना, उनसे स्पष्टीकरण की अपेक्षा करना अपराध हो गया है।
क्या इस देश की जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि देश के 118 करोड़ लोगों का भाग्य जिन लोगों के हाथों में हैं, वे आखिर हैं कौन? जब भारत सरकार इस देश में रहने वाले लोगों की मंशा और कार्यकलापों की जांच करने के लिए पूरे देश की सुरक्षा एंजेसिंयो को झौंक सकती है, तो उस विदेशी मूल की महिला की जांच करने में किसी को क्यों और क्या आपत्ति हो सकती है, जिसके कारण देश की जनता को मन संदेह की भावना उपज रही है।
सभी जानते हैं कि श्रीमति इंदिरा गांधी ने बडे़ ही अनमने मन से राजीव और श्रीमति सोनिया गांधी के विवाह पर अपनी सहमति दी थी। एक बार इस घर की बहू बन जाने के बाद स्वयं श्रीमति इंदिरा गांधी और भारत की जनता ने श्रीमति सोनिया गांधी को सहज हृदय से स्वीकार किया था। मन में उलझन तो तब पैदा होती है, जब भारतवासी तो श्रीमति सोनिया गांधी में अपना विश्वास प्रकट करते हैं, परन्तु जब जब मौका आता है श्रीमति सोनिया गांधी की भारत के प्रति निष्ठा आश्चर्यजनक रूप से संदिग्ध दिखती है। 1968 में राजीव गांधी से विवाह होने के बाद से ही श्रीमति सोनिया गांधी का जीवन रहस्यमय ही बना हुआ है। कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जिनका जवाब हर भारतीय के सशंकित मन को संतुष्ट कर सकता है, इसलिए श्रीमती सोनिया गाँधी को चाहिए की वे कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष होने के नाते ना सही लेकिन इस देश की बहू होने के नाते ही इन प्रश्नों का जवाब जरुर दे।
पहला यह कि क्या कारण था जिसके चलते १९७७ के आम चुनावों श्रीमति इंदिरा गांधी की पराजय के बाद श्रीमति सोनिया गांधी ने अपने बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ इटली के दूतावास में शरण ली? क्या उन्हैं सत्ता परिवर्तन होने के साथ ही गांधी परिवार के वर्चस्व की समाप्ति का भय सता रहा था, या वे भारत को अपने और अपने बच्चों के लिये सुरक्षित जगह नहीं मानती थीं?
दूसरा प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि श्रीमति सोनिया गांधी किस वंश की ‘” शाखा” हैं। उनका असली नाम सोनिया माइनो है या एंतोनियो माइनो? उनका जन्म लुसियाना में हुआ या ओरबासानो में? क्योंकि श्रीमति सोनिया गांधी के जन्म प्रमाणपत्र में उनका नाम एंतोनियो माइनो है, एंतोनियो माइनो कैसे सोनिया माइनो बनी, इसके पीछे की क्या कहानी है, इसको जानने का हक तो सामान्य भारतीय को है ही।
तीसरा प्रश्न यह भी है कि क्या आर्थिक तंगी से परेशान होकर श्रीमति सोनिया गांधी ‘नन’ बनना चाहती थी, और उसके लिए उन्होंने घर छोड़ा? लेकिन उनके पिता स्टीफनो माइनो ने उन्हैं कैम्ब्रिज भेज दिया, जहां वे रोजगार करने के साथ ही अपनी पढ़ाई भी कर रही थी?
चौथा प्रश्न भारत सरकार के मंत्री और स्व0 राजीव गांधी के मित्र रहे श्री सुब्रमण्यम स्वामी आज भी पूछ रहे हैं कि कैम्ब्रिज में उन्होंने शिक्षा कहां से और किस स्तर तक प्राप्त की? क्योंकि जो दावा श्रीमति सोनिया गांधी ने लोकसभा को दिये अपने जीवन वृत्त में किया है, उसको तो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने झुठला दिया है। लोग ये जानना चाहते हैं कि श्रीमति सोनिया गांधी और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में से कौन झूठा है? यदि श्रीमति सोनिया गांधी ने झूठ बोला तो क्यों और यदि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय झूठ बोल रहा है तो क्यों?
पांचवा महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि भारत ही नहीं विश्व के प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवारों में से एक नेहरू-इंदिरा परिवार की बहु बनने के बाद श्रीमति सोनिया गांधी ने किन मजबूरियों के चलते इंश्यारेंस एंजेंट का काम लिया और अपने विजिटिंग कार्ड में भारत के प्रधानमंत्री के आवास को अपना निवास स्थान बताया?
छठा प्रश्न तो स्विट्जरलैंड की प्रतिष्ठित पत्रिका द्वारा किये गए खुलासे पर आधारित है। स्विट्जर इलैस्टेट नामक इस पत्रिका ने 11 नवम्बर1991 के अंक में खुलासा किया कि राजीव गांधी और उनकी पत्नी श्रीमति सोनिया गांधी के स्विस बैंक के गुप्त खाते में दो अरब (2 बिलियन) डालर थे। यह खाता उनकी नाबालिग संतानों के नाम से था, इतना पैसा इस परिवार के कहां से आया? इस समाचार का आज तक खंडन क्यों नहीं किया गया? क्या भारत के नागरिकों को यह भी जानने का अधिकार नहीं है कि श्रीमति सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इस देश के अलावा विदेशों में भी बैंक एकाउन्ट हैं या नहीं?
संातवा प्रश्न,हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शिक्षा शास्त्री येवजेनिया अल्बास ने रशियन गुप्तचर एंजेंसी के जी बी द्वारा किये गए पत्र व्यवहार को देखकर बताया है कि विक्टर चेब्रीकोव ने लिखित में ‘भुगतान यू एस डॉलर में लेने के लिए राजीव गांधी के परिवारिक सदस्यों सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और पावलो माईनो (श्रीमति सोनिया गांधी की मां) को ‘‘अधिकृत’’ किया।’ क्या भारत की जनता इस प्रश्न का जवाब नहीं जानना चाहेगी कि श्री विक्टर चैब्रीकोव कौन हैं? और इन्होंने किस कारण से और कितनी राशी का भुगतान दिसम्बर 1985 में इस परिवार को किया?
आठवां प्रश्न श्रीमति सोनिया गांधी के ओतोवियो क्वात्रोच्ची के आपसी संबंधों पर आधारित है। श्रीमति सोनिया गांधी के ओतोवियो क्वात्रोच्ची से क्या संबंध हैं? एक हथियार सौदागरों के दलाल से भारतीय बहू के संबंधों के खुलासे के लिये भारत परिवार आज भी इंतजार कर रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस ‘दलाल’ के जरिये विदेशी गुप्तचर एंजेसिंया भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा का भेद ले रही हों।
नवां प्रश्न श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा की जा रही व्यापारिक गतिविधियों पर केन्द्रित है । श्रीमति सोनिया गांधी को इस आरोप पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये कि इतना पैसा और विदेशों में एकाउंट होने के बावजूद वे किन वस्तुओं के आयात निर्यात का व्यापार करती थीं? क्या यह समस्त राशी उसी व्यापर के कारण अर्जित की गई है? और यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिये कि श्रीमति सोनिया गांधी के अलावा क्या उनकी बहनें भी इस व्यापार में उनकी साझीदार हैं।
दसवें और अंतिम प्रश्न के रूप में यह जानना भी अत्यावश्यक है कि श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा इटेलियन पासपोर्ट लौटा देने की स्थिति में क्या उनकी इटली की नागरिकता स्वतः ही समाप्त हो जाती है? इसी प्रकार क्या राहुल और प्रियंका गांधी के पास आज भी इटेलियन पासपोर्ट है? और वे अपनी विदेश यात्राऐं किस देश के पासपोर्ट पर करते हैं?
ये सिर्फ 10 सहज और छोटे से प्रश्न हैं, जिनका जवाब 118 करोड़ भारतीयों को संतुष्ट कर सकता है। जरूरत इस बात की है कि श्रीमति सोनिया गांधी पर उठने वाले हर सवाल पर हल्ला मचाने की बजाय कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता इन प्रश्नों के जवाब दें।
सवाल यह नहीं है कि श्रीमति सोनिया गांधी का विरोध करके ही कांग्रेस विरोधी दलों की राजनीति चलती है, सवाल इससे भी अधिक गहरा और गंभीर है कि जिस व्यक्ति के अतीत के बारे में हम पुख्ता रूप से नहीं जानते, जिस व्यक्ति ने अपने आपसी संबंधों को देश के 118 करोड़ लोगों की भावनाओं से ज्यादा अहमियत दी, जिसने भारत की जनता को तो क्या अपनी ही पार्टी को सच्चाई बताने की कोशिश नहीं की, जो श्रीमति सोनिया एक ऐसी महिला को अपना प्रमुख सिपहसालार बनाती है, जिससे ना केवल राजीव गांधी सख्त नफरत करते थे अपितु उस महिला ने श्रीमति इंदिरा गांधी तक को डायन कह डाला, और अति तो तब हो गई जब श्रीमति सोनिया गांधी ने राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए दक्षिण भारत के उस राजनीतिक दल का भी समर्थन ले लिया जिसने राजीव गांधी के हत्यारों को बचाने का प्रयास किया था।
तो जब इतने सारे भ्रम और प्रश्न सामने हों तो कांग्रेस के नेताओं और उसके कार्यकर्ताओं को बजाय हो हल्ला मचाकर प्रश्न करने वालों को चुप कराने के इन प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करना चाहिये, जिससे देश राजनीतिक रूप से सशक्त और समर्थशाली नेताओं के हाथों में सुरक्षित रहे।

Wednesday, November 3, 2010

भ्रष्टाचरण और कांग्रेस

जरा याद कीजिये 2009 का आम चुनाव। कांग्रेस ने स्लम डॉग मिलेनियर फिल्म के गीत ‘जय हो’ को चुनावों हेतु अपने लिए ब्रांड गीत बनाया था, और उसी गीत को गांव गांव बजाकर वह सत्ता के सिंहासन पर जा बैठी। सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली यू पी ए ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में एक बार फिर सत्ता संभाल ली। सत्ता संभालने के दो साल बाद ही यू पी ए सरकार की नीतियों के कारण आत्महत्या कर रहे किसानों पर बनी फिल्म ‘पीपली लाइव’ के जरिये एक और गीत सामने आया, ‘सखी, सैंया तो बहुत ही कमात हैं, मंहगाई डायन खाए जात है’। ये दोनों गीत ही कांग्रेसी शासन की कथनी और करनी का अन्तर स्पष्ट कर देते हैं।
हाल ही में मुम्बई में सामने आए आवास घोटाले ने एक बार फिर साबित किया है कि कांग्रेस को सत्ता भ्रष्टाचार का नंगा खेल करने के लिए ही चाहिये। यह बार बार याद रखे जाने की जरूरत है कि जैसे भारत के स्वाधीनता आंदोलन नेतृत्व का श्रेय महात्मा गांधी को दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार आजाद भारत में सत्ता के सर्वाधिक दुरूपयोग और उसे भ्रष्ट करने के लिये जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गाँधी का नेतृत्व जिम्मेदार है।
दरअसल, कांग्रेस ने एक राजनीतिक दल और सरकार के रूप में अपने अधिकार का इस कदर दुरूपयोग किया कि सिर्फ कांग्रेस ही नहीं भारत की संपूर्ण राजनीति भ्रष्टाचार का केन्द्र बन गई । यह पूछा ही जाना चाहिये कि लोहिया और जयप्रकाश के शिष्य लालू यादव और मुलायम सिंह ने राजनीति में भ्रष्टाचार करना कहां से सीखा? यह भी जानने की जरूरत है कि अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग और मुसलमानों का पक्का वोट बैंक होने के बाद भी हर चुनाव में बसपा पर टिकिट बेचने के आरोप क्यों लगते हैं? ऐसा कौन होगा जिसने राजनीति में
शुचिता लाने के लिए कृत संकल्प राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक लाख रूपये की रिश्वत लेते हुए टेलीविजन पर नहीं देखा? और वामपंथियों ने तो भ्रष्ट आचरण की ऐसी आंधी चलाई जो केवल रूपये पैसे तक सीमित नहीं रही, अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए उसने कई बेगुनाहों को अपनी राजनीतिक बर्बरता का निशाना भी बनाया।
जब गंगा का उद्गम ही गंदा और अपवित्र हो तो वह पवित्रता कहां से प्रदान करेगी? आजादी के बाद कांग्रेस और विशेषकर नेहरू परिवार ने सत्ता का उपभोग किया है, यह ही वह समय था जब भारत के सम्मान और स्वाभिमान की नींव रखी जानी थी, इस दौर की ही सरकारों पर यह जिम्मेदारी थी कि वे भारत के नागरिक को स्वच्छ, ईमानदार और संवेदनशील प्रशासन उपलब्ध कराते, जिसमें आम आदमी अपनी गरिमा को महसूस कर पाता। लेकिन कांग्रेस के नेताओं ने ऐसा रास्ता चुनना ज्यादा बेहतर समझा, जिसमें उनके वंश और पीढ़ियों के राजनीतिक साम्राज्यशाही की रक्षा तो होती थी, परन्तु आम भारतीय पांच साल में एक बार वोट देने वाला ऐसा गरीब और बेबस मतदाता बन गया जो हर बार अपनी तकदीर संवारने के लिए वोट देता था, और उसे हर बार लुभावने नारों और विज्ञापनों के जरिये छल लिया जाता था।
दरअसल, नेहरू की कांग्रेस ने भ्रष्टाचार की शुरूआत 1948 में ही कर दी थी, जब कश्मीर में पाकिस्तान की धुसपैठ का जवाब देने के लिए सेना के लिए खरीदी जाने वाली जीपों में ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त कृष्णा मेनन की भूमिका सामने आई। इन्हीं कृष्णा मेनन की भ्रष्ट भूमिका को जानते बूझते हुए नेहरू सरकार ने ना केवल उनके खिलाफ चल रही जांच को बंद कर दिया, अपितु कृष्णा मेनन के चुप रहने की कीमत पण्ड़ित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हैं मंत्रीमंडल में शामिल कर के चुकाई।
भारतमाता की सुरक्षा के लिए खरीदी गई बोफोर्स तोप से लेकर कारगिल में शहीद हुए सैनिक अधिकारियों के लिए मुंबई में आदर्श हाउसिंग सोसायटी द्वारा बनाए गए फ्लैट्स घोटाले ने यह भी साबित कर दिया है कि कांग्रेस के लिए सैनिकों की कीमत एक चोकीदार से ज्यादा नहीं है? कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गाँधी से लेकर प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह तक ने आज तक कांग्रेस पार्टी द्वारा किए गए अपराधों के लिए देश से क्षमा नहीं मांगी है, अपितु वे इन मामलों में लीपा पोती करने की ही कोशिश कर रहे हैं।
आश्चर्य की बात तो यह है कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को हिन्दुस्तान के अंदर दो हिंन्दुस्तान तो नजर आते हैं। एक गरीब हिन्दुस्तान और दूसरा अमीर हिन्दुस्तान, और वे गरीब हिन्दुस्तानियों को कांग्रेस से जोड़ने के लिए तरह तरह के स्वांग रचते हुए भी दिखाई देते हैं। लेकिन वे कभी आजाद भारत में हुए भ्रष्टाचार पर श्वेत पत्र प्रकाशित करने की बात नहीं कहते। वे ये भी नहीं कहते कि विदेशों में जमा काला धन भारत में लाने के लिए उनके पास क्या कार्ययोजना है? उनकी बातें तो बड़ी बड़ी और साफ सुथरी हैं लेकिन क्या उनके पास इस बात का जवाब है कि बोफोर्स तोप दलाल क्वात्रोची को किस राजनीतिक परिवार के संरक्षण के कारण भारत का कानून सजा नहीं दे पाया है। दरअसल, वे ऐसे राजकुमार की तरह बर्ताव कर रहे हैं जो अपने साम्राज्य को बनाए रखने के लिए तरह तरह के स्वांग रच रहा है। राहुल गांधी को चाहिये कि वे राजनीति से कुछ समय निकाल कर अपनी युवा टीम के साथ नॉक आउट फिल्म देखें, जिसमें विदेशों में जमा भारतीय मुद्रा को वापस लाने की फिल्मी कोशिश की गई है।
क्या कोई भी व्यक्ति जो राजनीतिक मामलों की जरा सी भी समझ रखता है, वो इस बात पर सहमत हो सकता है कि पिछले महिने संपन्न हुए राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में हुए भ्रष्टाचार में कांग्रेसी नेता शामिल नहीं थे? भारतीय ओलम्पिक संघ के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने खुद यह माना है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित की पूरे आयोजन की तैयारी में “बड़ी भूमिका” थी। ध्यान देने योग्य बात यह है कि नेहरू-गांधी परिवार के अति विश्वस्त लोगों के नाम ही भ्रष्टाचार करने में प्रमुख हैं। प्रश्न यह है कि भोपाल गैस त्रासदी के ‘खलनायक’ मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह आज कहां हैं? तेल के बदले अनाज घोटाले के मुख्य किरदार पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह आज कितने लोगों को याद हैं? और छत्तीसगढ़ के अजीत जोगी तक राजनीतिक परिदृष्य से गायब हैं।कांग्रेस का यह तंत्र भ्रष्ट तरीके से अर्जित किये गए धन को वापस वसूलने की बजाय उस व्यक्ति को हटा देने में ज्यादा विश्वास रखता है, जिसका भ्रष्टाचार उजागर हो गया है।

कॉमनवेल्थ खेल हों या नरेगा कार्यक्रम कांग्रेस सत्ता किसी भी काम की शुचिता को बनाये रखने में विफल रही है। तो जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता ही उनके नेताओं द्वारा संरक्षित, पोषित और पल्लवित भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़े हों और भारत के जन को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करने के लिए अपने ‘गिलहरी’ के समान ही सही योगदान को देकर अपने राजनीतिक जीवन को सार्थक करें, क्योंकि यदि गंगोत्री पावन और पवित्र होगी तो वह गंगा अपनी निर्मलता से पूरे देश को भ्रष्टाचार के संत्रास से मुक्त करा देगी।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
(लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं)

Sunday, October 24, 2010

इन्द्रेश कुमार का सच

क्या कोई भी निरपेक्ष और निष्पक्ष व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकवादी संगठन कह सकता है? क्या आतंकवादी संगठन वन्देमातरम् का गान करते हैं? या वे प्रतिदिन अपनी प्रार्थनाओं में ‘परम वैभव नैतुमेतत् स्वराष्ट्रं ’ का उद्घोष करते हैं? क्या समाज में रहने वाले करोड़ों स्वयंसेवकों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हित चिन्तकों को देखकर मन से आतंकवादी होने का भय उपजता है? क्या जो लोग निकर पहनकर और हाथ में डंडा लेकर शाखा जाते हैं, वे अपने ‘संघस्थान’ पर देश में सांप्रदायिक हमलों की रणनीति बनाते हैं? इन प्रश्नों का जवाब ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चाल, चरित्र और चेहरे को स्पष्ट कर देता है।
दरअसल, जो लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं , वे कभी भी संघ की विचार और व्यवहार धारा को समझ ही नहीं पाये। वे कभी यह नहीं जान पाये कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जनमानस में इतना आदर क्यों प्राप्त है? वे तो सिर्फ इतना समझ पाये हैं कि स्वतंत्र भारत में यह ही एकमात्र ऐसा संगठित संगठन है, जिसके एक आह्वान पर लाखों लोग अपना काम धाम छोड़कर चले आते हैं और यह ही वह ताकत है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरोधियों को डराती है। क्या किसी ने एक बार भी सोचा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध कौन लोग करते हैं? उनका राजनीतिक सोच और द्रष्टिकोण किन आधारों और विश्वसों पर आश्रित है? आखिर क्यों राजनीतिक दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझने की बजाय अपने मतदाताओं को भरमाते रहते हैं?
दरअसल, जब जब कांग्रेस की सत्ता होती है, तो उसके निशाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही रहता है, क्योंकी पूरी की पूरी राजनीतिक व्यवस्था यह मानती है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्राण देश भक्ति में ही बसते हैं और यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन से देश भक्ति की प्राण वायु को निकाल दिया जाए तो यह संगठन अपने आप ही निस्तेज और प्राणहीन हो जाएगा और एक बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्राणहीन कर दिया तो फिर देश के हितों और भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले राजनेताओं पर कोई लगाम ही नहीं रह जाएगी। इसीलिए हर मौके बेमौके पर संघ को बदनाम कर सकने वाली हर कोशिश करना राजनेता अपना पुनीत कर्तव्य समझते हैं।
अब जरा बात हो जाए अजमेर दरगाह ब्लास्ट के मामले की जांच की। याद कीजिए बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव। तब भी केन्द्र में यही सरकार थी और रेल मंत्री थे श्रीमान लालू प्रसाद यादव। उन्होंने मुस्लिम मतों को अपनी तरफ करने के लिए गोधरा कांड के लिए एक अलग से जांच आयोग गठित किया था, उस जांच आयोग की रिपोर्ट भी आ गई , परन्तु कार्यवाही आज तक नहीं हुई । लालू यादव और सोनिया गांधी अब गोधरा के बारे में बात ही नहीं करते। इसी प्रकार इस बार भी बिहार विधानसभा चुनाव का मौका है, जहां पर कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता उनको अगला प्रधानमंत्री घोषित करने से नहीं थक रहे हैं और जनमत जनता दल और भाजपा के पक्ष में जा रहा है, ऐसे में एक ही उपाय है, मुस्लिमों को पक्ष में करने के लिए संघ की बदनामी और इस बार बारी है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार की ।
अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामले में सत्ता की आंख देखकर कार्य करने वाली सरकारी व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में है। इस मामले में आरोपियों को पकड़ा जा चुका है, उनके खिलाफ चालान पेश हो रहे हैं और उन आरोपियों की पृष्ठभूमी के आधार पर जिस तरह से सरकारी अमला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने की साजिश रच रहा है, उससे सरकारी कार्य तंत्र की ही संदेह के घेरे में है।
सरकारी आरोप है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के सदस्य इन्द्रेश कुमार अजमेर दरगाह ब्लास्ट के षड़यंत्र में सहभागी हैं, इसके लिए उन्होंने जयपुर स्थित गुजराती समाज की धर्मशाला में एक भाषण भी दिया। आश्चर्य इस बात का है कि छोटे से छोटा अपराधी भी अपनी योजनाओं के बारे में किसी से कुछ नहीं कहता, लेकिन ए टी एस कहती है कि अजमेर दरगाह ब्लास्ट को अंजाम देने के लिए इन्द्रेश कुमार ने भाषण दिया।
इस पूरी कहानी में एक बार भी सरकारी पक्ष ने इन्द्रेश कुमार से बात नहीं की, उन्होंने अपने भाषण में क्या कहा, वह नहीं बताया और वह भाषण किस संस्था के कार्यक्रम में दिया गया और उसमें कौन कौन लोग उपस्थित थे, यह भी ए टी एस को नहीं पता? तो फिर यह क्यों नहीं माना जाए कि सरकारी एंजेसियां सत्ता में बैठे लोगों की आंख देख कर अपने कर्तव्यों को पूरा कर रही हैं।
ध्यान देने लायक तथ्य यह भी है कि जिस इन्द्रेश कुमार ने इतना बड़ा षड़यंत्र रचा, उसके खिलाफ पूरी सरकार ने अभियोग पत्र भी प्रस्तुत करने की मेहनत तक नहीं की, और ना ही इतने ‘खतरनाक मास्टर माइंड’ को 2007 से लेकर चालान पेश किये जाने तक गिरफ्तार कर पूछताछ की गई । यह तो सारा मामला ही राजनीतिक अव्यवस्था का घटिया नमूना है।
जांच तो इस बात की भी की जानी चाहिये कि जिस व्यक्ति के खिलाफ अभियोग पत्र भी नहीं बन पाया, उस व्यक्ति और संस्था को मीडिया के जरिये किसने और क्यों बदनाम करने की साजिश रची ? पूरी दुनिया में तब तक किसी को अपराधी नहीं माना जाता जब तक अदालत में उस व्यक्ति का दोष सिद्ध नहीं हो जाए, लेकिन इस मामले में तो अदालत में चालान पेश करने से पूर्व ही इन्द्रेश कुमार का नाम कांग्रेस के नेता ले रहे थे।
यह भी महत्त्वपूर्ण है कि अजमेर दरगाह ब्लास्ट का चालान पेश होने से पूर्व सोनिया गाँधी के विश्वस्त महासचिव दिग्विजय सिंह अकारण और असंदर्भित बयान जारी कर कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पाकिस्तानी खुफिया एंजेसी आई एस आई से मदद मिलती है। उसके बाद सोनिया पुत्र राहुल गांधी अपने ‘विवेक’ से मत व्यक्त करते हैं कि उनके लिए संघ और सिमी में कोई अन्तर नहीं है। उसके बाद सोनिया गांधी के ही एक कृपा पात्र अशोक गहलोत की सरकारी आंख देखकर अजमेर दरगाह ब्लास्ट में संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार का चार्जशीट में नामोल्लेख किया जाता है । क्या इन सभी बातों का एक ही क्रम में होना महज एक संयोग है या पूरी कांग्रेस बिहार में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के खिलाफ माहौल बना रही है, जिससे मुसलमानों को अपने पक्ष में किया जा सके।
दरअसल, यह समझे जाने की जरूरत है कि जब जब कांग्रेसी सत्ता ने सरकारी तंत्र के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित करने, बदनाम करने की कोशिश की है, तब तब यह संगठन और ताकतवर होकर सामने आया है। समझना कांग्रेस को है कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ताकत प्रदान करना चाहती है या देशभक्तों के इस सैलाब को रोकना चाहती है, यदि कांग्रेस के नेताओं की दिलचस्पी वास्तव में संघ को समाप्त करने में है, तो उन्हैं वह राष्ट्रवादी स्वरूप अंगीकार करना होगा जो तिलक, मालवीय, गांधी, सरदार पटेल, गोखल और सुभाष चंद्र बोस के मनों में बसती थी।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
लेखक सेण्टर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।