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Tuesday, March 15, 2011

क्या मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री हैं ?

जब जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दिखते हैं तो उनकी भाव भंगिमा देखकर एक ही प्रश्न परेशान करता है कि क्या मनमोहन सिंह अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, चीन के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ या फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस जरकोजी या रूसी राष्ट्रपति दिमित्र मेदेवदेव या इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड केमरुन जितने असरदार और चमकदार राजनेता हैं? और क्या विनम्र और धीमी आवाज वाले विद्वान मनमोहन सिंह कहीं से भी पूरे विश्व को और भारत के नागरिकों को भारत का प्रधानमंत्री होने का आभास दे पा रहे हैं हैं

प्रश्न यह भी है कि क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के स्वाभिमान का उत्कट और चमकता हुआ चेहरा हैं, और उसी तरह पूरे विश्व में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसा कि पूर्व में नेहरू, इंदिरा, राजीव, नरसिंहराव, चंद्रशेखर या अटलबिहारी वाजपेयी करते थे या मनमोहन सिंह किसी राज्य सरकार के मुख्य सचिव या ऐसे ही किसी नौकरशाह की तरह दिखते हैं, जिसकी जिम्मेदारी अपने बॉस के आदेशों को पूरा करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। चाहे देश की आवाज कुछ भी हो और बॉस कितना ही पथभ्रष्ट क्यों ना हो?

तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ खड़ा होता है कि भारत का प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिये? क्या हमें ऐसा प्रधानमंत्री चाहिये जो एक बार भी लोकसभा से चुनकर नहीं आया हो, और ना ही लोकसभा चुनाव लड़कर सदन में आने की इच्छा रखता हो। और यह भी कि वह व्यक्ति भारत के नागरिकों द्वारा चुनी गई लोकसभा का कभी सदस्य ही नहीं रहा और प्रधानमंत्री बनने के बावजूद उसने कभी लोकसभा में जाने और उसका नेतृत्व करने की चुनौती को स्वीकार नहीं किया। यह प्रश्न उस व्यक्ति के लिए आश्चर्यजनक लग सकता है जो विगत 7 सालों से देश के प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहा हो, और जरा यह भी सोचने की बात यह भी है कि इन 7 सालों में उस प्रधानमंत्री से जनता से सीधे संवाद के लिए कितनी जनसभाओं को संबोधित किया है?

क्या संविधान के निर्माताओं ने इसी दिन के लिए राज्यसभा की रचना की थी कि देश की बागडोर संभालने वाला व्यक्ति लोकसभा में आने के लिए निर्धारित चुनाव प्रक्रिया का पालन नहीं करे और संविधान में प्रदत्त इस छूट का इस्तेमाल पद पर बने रहने के लिए करे? यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी जगह सही हैं तो फिर प्रश्न यह भी उठता है कि नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक जितने भी प्रधानमंत्री इस देश में हुए हैं, उन्होंने लोकसभा का चुनाव ही क्यों लड़ा? क्या उनके लिए राज्यसभा में निर्वाचित होना दुरूह कार्य था?

1991 में नरसिंहराव मंत्री मंडल में वित्त मंत्री के रूप में शामिल हुए मनमोहन सिंह ने राज्यसभा के जरिये देश की सर्वोच्च नियामक संस्था संसद में प्रवेश किया। उनका पहला कार्यकाल 4 वर्ष के लिए था। उसके बाद से लेकर आज तक वे 3 बार संसद में पहुंचते रहे हैं और हर बार वे जनता द्वारा चुने जाने की अपेक्षा पार्टी के प्रतिनिधि बनकर राज्यसभा में ही पहुंचते हैं। तो क्या ये माना जाना चाहिये कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जवाबदेही देश की जनता के प्रति नहीं अपितु पार्टी के पदाधिकारियों के प्रति है, जो उनका राज्यसभा में जाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। क्या यह प्रश्न भी नहीं पूछा जाना चाहिये कि हमारे प्रधानमंत्री लोकसभा चुनावों से क्यों कतराते हैं? 1991 से लेकर आज तक 4 बार आम चुनाव हो चुके हैं और 1998 के लोकसभा चुनावों में नई दिल्ली से चुनाव लड़ने (जिसमें वे पराजित हो गये थे) के अलावा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कभी कोई और चुनाव लड़ने का प्रयास ही नहीं किया।

बात सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था के तहत एक पद को भरे जाने की नहीं है। यह प्रश्न सांस्कुतिक और भाषाई विविधता वाले दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र के नेतृत्व का है। यदि पद ही भरना होता तो सोनिया गांधी भी भर सकती थीं, लेकिन उनका विरोध राजनीतिक दलों ने इस आधार पर किया कि वे सम्पूर्ण विश्व में भारत का चेहरा नहीं हो सकती ? वे स्व0 राजीव गांधी की पत्नी हो सकती हैं लेकिन इंदिरा नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही ईमानदार और बुद्धिमान व्यक्ति की तरह जाने जाते हैं लेकिन वे भारत के गौरवशाली अतीत और उसके आत्म स्वाभिमान को प्रकट नहीं करते। उनकी छवि एक ऐसे प्रशासक के रूप में उभरकर सामने रही है जो बेबस और बेचारा है। जिसका इकबाल ना तो उसके मंत्री मंडलीय सहयोगी ही मानते हैं और ना ही उनका राजनीतिक दल। वे तो एक ऐसे बडे बाबू की तरह दिख रहे हैं जिनकी नाक के नीचे 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो जाता है, और वे कुछ नहीं कर पाते। एक मंत्री क्रिकेट मैच में अपनी हिस्सेदारी तय करता है और उन्हैं पता नहीं चलता, एक मंत्री अपनी गलत नीतियों के कारण महंगाई को बढ़ाकर मुनाफाखोरी को बढ़ावा दे रहा है और वे बेबस हैं। पूरा देश चीख चीख कर भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ सड़कों पर रहा है और वे मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर भ्रष्ट आचरण के दोषी व्यक्ति कोअज्ञानवश नियुक्त कर देते हैं।

वे पाकिस्तान के साथ परदे के पीछे ना जाने क्या बात करते हैं जिसका पता मंत्री मंडलीय सहयोगियों को भी नहीं होता है, विपक्ष की बात तो बहुत दूर की रही। वे कहने को तो सरकारी खजाने से एक रूपये का वेतन लेते हैं लेकिन उन्हीं के नेतृत्व में चल रही सरकार की अनियमितताओं पर वे कोई जवाब दे नहीं पाते।

इसलिये जब हम सांस्कृतिक और भाषाई विविधता और विशाल लोकतंत्र वाले भारत के नेतृत्व की बात करते हैं तो निश्चित ही सरदार मनमोहन सिंह बौने नजर आते हैं। स्वतंत्र भारत में इतना कमजोर प्रधानमंत्री कार्यालय उस समय भी नहीं हुआ, जब गुलजारी लाल नंदा, एच डी देवगौडा या इंद्र कुमार गुजराल मजबूरी में प्रधानमंत्री बनाए गए थे। हो सकता है कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बने रहने की कोई मजबूरी हो, यह भी संभव है कि उनकी पार्टी के नेताओं के पास मनमोहन सिंह से ज्यादा योग्य व्यक्ति इस पद के लिए ना हो, लेकिन भारत की 118 करोड़ की जनता ऐसे किसी भी व्यक्ति को प्रधानमंत्री के पद नहीं देखना चाहती जो बेबस और लाचार हो तथा उसको अपने हर कार्य की मंजूरी लेने के लिए एक नौकरशाह की तरह भाग दौड़ करनी पड़ती हो और वो जनता के प्रति अपनी जवाबदेही समझने की बजाय अपने बॉस के प्रति निष्ठां रखता हो .

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं)

Sunday, November 14, 2010

सोनिया गांधी से जवाब मांगते सवाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवर्तमान सरसंघचालक श्री कुपहल्ली सीतारमैया सुदर्शन द्वारा कांग्रेस और संप्रग की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी पर की गई टिप्पणियों से राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जब भी किसी व्यक्ति ने श्रीमति सोनिया गांधी के खिलाफ कुछ भी कहा है, तो कांग्रेस और उसमें पलने-बढ़ने वाले नेताओं ने हंगामा मचा दिया है। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि श्रीमति सोनिया गांधी के खिलाफ बोलना, उनसे स्पष्टीकरण की अपेक्षा करना अपराध हो गया है।
क्या इस देश की जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि देश के 118 करोड़ लोगों का भाग्य जिन लोगों के हाथों में हैं, वे आखिर हैं कौन? जब भारत सरकार इस देश में रहने वाले लोगों की मंशा और कार्यकलापों की जांच करने के लिए पूरे देश की सुरक्षा एंजेसिंयो को झौंक सकती है, तो उस विदेशी मूल की महिला की जांच करने में किसी को क्यों और क्या आपत्ति हो सकती है, जिसके कारण देश की जनता को मन संदेह की भावना उपज रही है।
सभी जानते हैं कि श्रीमति इंदिरा गांधी ने बडे़ ही अनमने मन से राजीव और श्रीमति सोनिया गांधी के विवाह पर अपनी सहमति दी थी। एक बार इस घर की बहू बन जाने के बाद स्वयं श्रीमति इंदिरा गांधी और भारत की जनता ने श्रीमति सोनिया गांधी को सहज हृदय से स्वीकार किया था। मन में उलझन तो तब पैदा होती है, जब भारतवासी तो श्रीमति सोनिया गांधी में अपना विश्वास प्रकट करते हैं, परन्तु जब जब मौका आता है श्रीमति सोनिया गांधी की भारत के प्रति निष्ठा आश्चर्यजनक रूप से संदिग्ध दिखती है। 1968 में राजीव गांधी से विवाह होने के बाद से ही श्रीमति सोनिया गांधी का जीवन रहस्यमय ही बना हुआ है। कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जिनका जवाब हर भारतीय के सशंकित मन को संतुष्ट कर सकता है, इसलिए श्रीमती सोनिया गाँधी को चाहिए की वे कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष होने के नाते ना सही लेकिन इस देश की बहू होने के नाते ही इन प्रश्नों का जवाब जरुर दे।
पहला यह कि क्या कारण था जिसके चलते १९७७ के आम चुनावों श्रीमति इंदिरा गांधी की पराजय के बाद श्रीमति सोनिया गांधी ने अपने बच्चों राहुल और प्रियंका के साथ इटली के दूतावास में शरण ली? क्या उन्हैं सत्ता परिवर्तन होने के साथ ही गांधी परिवार के वर्चस्व की समाप्ति का भय सता रहा था, या वे भारत को अपने और अपने बच्चों के लिये सुरक्षित जगह नहीं मानती थीं?
दूसरा प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि श्रीमति सोनिया गांधी किस वंश की ‘” शाखा” हैं। उनका असली नाम सोनिया माइनो है या एंतोनियो माइनो? उनका जन्म लुसियाना में हुआ या ओरबासानो में? क्योंकि श्रीमति सोनिया गांधी के जन्म प्रमाणपत्र में उनका नाम एंतोनियो माइनो है, एंतोनियो माइनो कैसे सोनिया माइनो बनी, इसके पीछे की क्या कहानी है, इसको जानने का हक तो सामान्य भारतीय को है ही।
तीसरा प्रश्न यह भी है कि क्या आर्थिक तंगी से परेशान होकर श्रीमति सोनिया गांधी ‘नन’ बनना चाहती थी, और उसके लिए उन्होंने घर छोड़ा? लेकिन उनके पिता स्टीफनो माइनो ने उन्हैं कैम्ब्रिज भेज दिया, जहां वे रोजगार करने के साथ ही अपनी पढ़ाई भी कर रही थी?
चौथा प्रश्न भारत सरकार के मंत्री और स्व0 राजीव गांधी के मित्र रहे श्री सुब्रमण्यम स्वामी आज भी पूछ रहे हैं कि कैम्ब्रिज में उन्होंने शिक्षा कहां से और किस स्तर तक प्राप्त की? क्योंकि जो दावा श्रीमति सोनिया गांधी ने लोकसभा को दिये अपने जीवन वृत्त में किया है, उसको तो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने झुठला दिया है। लोग ये जानना चाहते हैं कि श्रीमति सोनिया गांधी और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में से कौन झूठा है? यदि श्रीमति सोनिया गांधी ने झूठ बोला तो क्यों और यदि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय झूठ बोल रहा है तो क्यों?
पांचवा महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि भारत ही नहीं विश्व के प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवारों में से एक नेहरू-इंदिरा परिवार की बहु बनने के बाद श्रीमति सोनिया गांधी ने किन मजबूरियों के चलते इंश्यारेंस एंजेंट का काम लिया और अपने विजिटिंग कार्ड में भारत के प्रधानमंत्री के आवास को अपना निवास स्थान बताया?
छठा प्रश्न तो स्विट्जरलैंड की प्रतिष्ठित पत्रिका द्वारा किये गए खुलासे पर आधारित है। स्विट्जर इलैस्टेट नामक इस पत्रिका ने 11 नवम्बर1991 के अंक में खुलासा किया कि राजीव गांधी और उनकी पत्नी श्रीमति सोनिया गांधी के स्विस बैंक के गुप्त खाते में दो अरब (2 बिलियन) डालर थे। यह खाता उनकी नाबालिग संतानों के नाम से था, इतना पैसा इस परिवार के कहां से आया? इस समाचार का आज तक खंडन क्यों नहीं किया गया? क्या भारत के नागरिकों को यह भी जानने का अधिकार नहीं है कि श्रीमति सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इस देश के अलावा विदेशों में भी बैंक एकाउन्ट हैं या नहीं?
संातवा प्रश्न,हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शिक्षा शास्त्री येवजेनिया अल्बास ने रशियन गुप्तचर एंजेंसी के जी बी द्वारा किये गए पत्र व्यवहार को देखकर बताया है कि विक्टर चेब्रीकोव ने लिखित में ‘भुगतान यू एस डॉलर में लेने के लिए राजीव गांधी के परिवारिक सदस्यों सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और पावलो माईनो (श्रीमति सोनिया गांधी की मां) को ‘‘अधिकृत’’ किया।’ क्या भारत की जनता इस प्रश्न का जवाब नहीं जानना चाहेगी कि श्री विक्टर चैब्रीकोव कौन हैं? और इन्होंने किस कारण से और कितनी राशी का भुगतान दिसम्बर 1985 में इस परिवार को किया?
आठवां प्रश्न श्रीमति सोनिया गांधी के ओतोवियो क्वात्रोच्ची के आपसी संबंधों पर आधारित है। श्रीमति सोनिया गांधी के ओतोवियो क्वात्रोच्ची से क्या संबंध हैं? एक हथियार सौदागरों के दलाल से भारतीय बहू के संबंधों के खुलासे के लिये भारत परिवार आज भी इंतजार कर रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस ‘दलाल’ के जरिये विदेशी गुप्तचर एंजेसिंया भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा का भेद ले रही हों।
नवां प्रश्न श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा की जा रही व्यापारिक गतिविधियों पर केन्द्रित है । श्रीमति सोनिया गांधी को इस आरोप पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये कि इतना पैसा और विदेशों में एकाउंट होने के बावजूद वे किन वस्तुओं के आयात निर्यात का व्यापार करती थीं? क्या यह समस्त राशी उसी व्यापर के कारण अर्जित की गई है? और यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिये कि श्रीमति सोनिया गांधी के अलावा क्या उनकी बहनें भी इस व्यापार में उनकी साझीदार हैं।
दसवें और अंतिम प्रश्न के रूप में यह जानना भी अत्यावश्यक है कि श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा इटेलियन पासपोर्ट लौटा देने की स्थिति में क्या उनकी इटली की नागरिकता स्वतः ही समाप्त हो जाती है? इसी प्रकार क्या राहुल और प्रियंका गांधी के पास आज भी इटेलियन पासपोर्ट है? और वे अपनी विदेश यात्राऐं किस देश के पासपोर्ट पर करते हैं?
ये सिर्फ 10 सहज और छोटे से प्रश्न हैं, जिनका जवाब 118 करोड़ भारतीयों को संतुष्ट कर सकता है। जरूरत इस बात की है कि श्रीमति सोनिया गांधी पर उठने वाले हर सवाल पर हल्ला मचाने की बजाय कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता इन प्रश्नों के जवाब दें।
सवाल यह नहीं है कि श्रीमति सोनिया गांधी का विरोध करके ही कांग्रेस विरोधी दलों की राजनीति चलती है, सवाल इससे भी अधिक गहरा और गंभीर है कि जिस व्यक्ति के अतीत के बारे में हम पुख्ता रूप से नहीं जानते, जिस व्यक्ति ने अपने आपसी संबंधों को देश के 118 करोड़ लोगों की भावनाओं से ज्यादा अहमियत दी, जिसने भारत की जनता को तो क्या अपनी ही पार्टी को सच्चाई बताने की कोशिश नहीं की, जो श्रीमति सोनिया एक ऐसी महिला को अपना प्रमुख सिपहसालार बनाती है, जिससे ना केवल राजीव गांधी सख्त नफरत करते थे अपितु उस महिला ने श्रीमति इंदिरा गांधी तक को डायन कह डाला, और अति तो तब हो गई जब श्रीमति सोनिया गांधी ने राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए दक्षिण भारत के उस राजनीतिक दल का भी समर्थन ले लिया जिसने राजीव गांधी के हत्यारों को बचाने का प्रयास किया था।
तो जब इतने सारे भ्रम और प्रश्न सामने हों तो कांग्रेस के नेताओं और उसके कार्यकर्ताओं को बजाय हो हल्ला मचाकर प्रश्न करने वालों को चुप कराने के इन प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करना चाहिये, जिससे देश राजनीतिक रूप से सशक्त और समर्थशाली नेताओं के हाथों में सुरक्षित रहे।