LATEST:


विजेट आपके ब्लॉग पर

LATEST:


विजेट आपके ब्लॉग पर
Showing posts with label राजनीति. Show all posts
Showing posts with label राजनीति. Show all posts

Sunday, January 20, 2013

कांग्रेस का राहुल चिंतन



पूरे देश में जश्न का माहोल है, जयपुर से दिल्ली और कश्मीर से कन्याकुमारी तक। कांग्रेस पार्टी ने कर लिया चिंतन। देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस का दो महीनों से चिर प्रतिक्षित चिंतन शिविर 18 और 19 जनवरी को जयपुर में सम्पन्न हो गया।  पूरा देश  सोच रहा था कि कांग्रेस के आला नेताओं के मार्गदर्शन में पूरी पार्टी देश के हालातों और अंतर्राष्ट्रीय परिदृष्य पर चिंतन करेगी और एक नए सोच के साथ देश को दिशा देगी, परन्तु देश को गहरी निराशा ही हाथ लगी,  करोड़ों रूपये खर्च करने के बाद भी कांग्रेस पार्टी देश को कोई नया चिंतन तो नहीं दे पाई, अलबत्ता उसने अपने राजकुमार राहुल गाँधी को कांग्रेस का भावी चेहरा बताकर 2014 में होने वाले चुनावों में अपना सेनापति जरूर घोषित कर दिया।
हांलाकि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने चिंतन शिविर की शुरूआत में पार्टी के सामने पांच प्रमुख चुनौतियों का जिक्र किया था   जिनमें महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचार, सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोप, सोशल मीडिया में कांग्रेस पर हो रही टीका टिप्पणी को रोकने में विफलता और इन सबके कारण कांग्रेस का घटता जनाधार प्रमुख रूप से सामने आए। लेकिन इन दो दिनों में कांग्रेस ने इन सबका एक ही समाधान खोजा- राहुल गांधी। प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी राहुल के अलावा किसी और को आगे रखने का साहस कर सकती थी ? इसलिये यह मानना न्यायसंगत नहीं होगा कि देश के कई सारे युवा नायकों की योग्यता परखने के बाद 125 साल पुरानी कांग्रेस ने अपने सबसे योग्य उम्मीदवार के रूप में राहुल गांधी को देश और पार्टी का चेहरा बनाने का निर्णय किया है।
पहले बिहार और फिर उत्तर प्रदेश  में कांग्रेस ने राहुल गांधी को चुनाव की कमान सौंपी थी। नतीजा सबके सामने है।  बिहार में कांग्रेस को 4 सीटें मिलीं और उत्तरप्रदेश  में कांग्रेस को 28 सीटों पर संतोष करना पड़ा। गुजरात में तो खैर राहुल गांधी दस्तूर के लिए ही गए।  यदि यही प्रदर्शन राहुल के अलावा किसी और कांग्रेसी नेता का होता तो कांग्रेस में उसका क्या हश्र होता, यह तो राजनीति की थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी बता सकता है।
बात यह नहीं है कि कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी को दूसरा बड़ा नेता बना दिया गया है और अब सोनिया गांधी के बाद पूरी पार्टी राहुल गांधी को ही रिर्पोट करेगी, बात यह है कि कांग्रेस ने राहुल गांधी  या गांधी परिवार के अलावा किसी और को आगे करने का साहस क्यों नहीं किया ?  ऐसी स्थिति में जबकि स्वयं कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी यह मान रही हैं कि मध्यम वर्ग का कांग्रेस के प्रति मोह भंग हो रहा है, देशभर की महिलाओं में कांग्रेस के प्रति निराशा  है, 2014 में होने वाले चुनावों के लिए कांग्रेस को नए सहयोगियों की खोज भी करनी पड़ेगी, पूरी कांग्रेस पार्टी मनमोहन सरकार के निर्णयों की अच्छाइयों को जनता के बीच ले जाने में असफल रही है और सरकार में भ्रष्टाचार भी चरम पर है, तो क्या इतनी सारी चुनौतियों से निपटने के लिए कांग्रेस को एक नए चेहरे को प्रस्तुत नहीं करना चाहिये था ? प्रश्न यह भी है कि क्या कांग्रेस पार्टी में कोई वास्तविक लोकतंत्र बचा भी है या यह पार्टी सिर्फ गांधी परिवार के नीचे जुटे राजनीतिक अवसरवादी राजनेताओं का जमघट मात्र रह गई है।
देश यह भी जानना चाहता है कि मुंबई हमले का समय हो या दामिनी प्रकरण के समय राहुल गांधी ने आगे आकर देश का मार्गदर्शन क्यों नहीं किया ? क्यों राहुल गांधी संसद सत्रों में विचारोत्तेजक बहस में भाग लेकर अपने विचारों से देश को अवगत कराते? राहुल गांधी में सोनिया पुत्र होने के अलावा ऐसी कौनसी योग्यता है जिसके कारण भारत जैसे विशाल देश को उनमें अपना भविष्य देखना चाहिये ? क्या मनमोहन सरकार के दौरान हुए भ्रष्टाचारो पर राहुल गांधी की राय किसी ने सुनी है ? या किसी ने आम आदमी के साथ वाली कांग्रेस सरकार के राज में आम आदमी की बदहाली पर राहुल के संवादों को महसूस किया है ?  या कोई यह बता दे कि राहुल भारत की विदेश नीति, शिक्षा नीति, अर्थनीति या राजनीति की गहरी समझ रखते हैं ?
दरअसल सच्चाई यह है कि कांग्रेस अपनें स्थापित नेताओं से छुटकारा पाना चाहती है, वह उन सभी बुर्जुग हो चुके नेताओं को यह संदेश देना चाहती है कि जब सोनिया गांधी अपने पुत्र के लिए रास्ता बना सकती हैं तो फिर इन स्थापित नेताओं को भी अपना स्थान अपनी अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए तैयार रहना चाहिये। जाहिर है राहुल गांधी की टीम के नाम पर जो युवाओं की फौज कांग्रेस में देखने को मिल रही है वह पुराने और धुरंधर राजनेताओं के पुत्रों की ही है, चाहे वो ज्योतिरादित्य सिंधिया हों, सचिन पायलट हों, जतिन प्रसाद हों या मिलिंद देवड़ा।
हकीकत यह भी है कि राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन में युवा कांग्रेस या कांग्रेस के छात्र संगठन एन एस यू आई से कोई कर्मठ और योग्य राजनेताओं या कार्यकर्ताओं का निर्माण करने में कोई सफलता हासिल नहीं की है, अपितु वे एक ऐसी राजनीतिक विरासत को अमली जामा पहना रहे हैं जो बुर्जुआ हो रही कांग्रेस की प्लास्टिक सर्जरी से ज्यादा कुछ और नहीं है। यह भी सच ही है कि राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा आगे किया जाना जनता का उन विषयों से ध्यान भटकाने की कोशिश मात्र है जिनकी बात राहुल की मां और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने चिंतन शिविर के उदघाटन करते हुए कही थी।
यह देश  को तय करना है कि वह कांग्रेस पार्टी की सामूहिक रूप से हो रही प्लास्टिक सर्जरी को ही देश में बदलाव की शुरूआत माने या फिर देश  में एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को जन्म दे, जो परिवारवाद की छाया से दूर लेकिन देश के प्रति मातृभक्ति को समर्पित राजनीतिक चिंतन और कार्यों के प्रति समर्पित हो।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंव डवलपमेंट के निदेशक हैं )


Sunday, March 27, 2011

उजली सूरतों का सच

पिछले दिनों विकीलीक्स द्वारा किये गए दो खुलासों ने भारतीयों को चिंता में डाल दिया है, इनमें एक खुलासा तो भारत के गृहमंत्री श्री पी चिदंबरम का अमरीकी राजदूत टिमोथी रोमर के मध्य हुई बातचीत का है, जिसमें पी चिदंबरम ने रोमर को कहा कि ’अगर भारत में पश्चिमी और दक्षिणी भाग ही होते तो भारत और ज्यादा समृद्ध होता‘। जिसका सीधा सा मतलब यह है कि हमारे गृह मंत्री भारत के अन्य भागों को पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों पर भार समझते हैं और वे संविधान की मूल भावना के अनुसार भारत की ’एकता और अखण्ड़ता को बनाए रखने की शपथ’ में कोई यकीन ही नहीं रखते, और विकास और समृद्धी के नाम पर ही सही यदि भारत को विभाजित किया जाए तो उन्हैं कोई आपत्ति नहीं है।
और दूसरा खुलासा राज्य सभा में विपक्ष के नेता श्री अरूण जेतली की अमरीकी राजनायिक राबर्ट ब्लैक से हुई बातचीत है, जिसमें जेतली ने ब्लैक से कहा कि ’भारतीय जनता पार्टी के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद एक अवसरवादी मुद्दा है। ‘जेतली का यह कहना दो संदेहों को जन्म देता है कि या तो जेतली, आज भी भारतीय जनता पार्टी के जन्म और उसके विकास यात्रा के सिद्धांत से अनभिज्ञ हैं या वे भारतीय जनता पार्टी को, उसके मातृ संगठनों को, उसके विचारों, सिद्धांतों और लाखों कार्यकर्ताओं को अपना गिरमिटिया मजदूर समझते हैं, जो उनकी कही हर बात का समर्थन करने को मजबूर हैं।
ये दोनों ही नेता भारतीय राजनीति में संभावना वाले राजनीतिज्ञ माने जाते हैं और दोनो ही नेताओं के लिए उनके दलों में यह माना जाता है कि वे भारत के प्रधानमंत्री होने की योग्यता रखते हैं। इसीलिए दोनों ही दल उन्हैं महत्व देते आये हैं और अपने दलों में प्राप्त इस महत्व के कारण ही उनका विदेशी राजनायिकों से मिलना जुलना लगा रहता है। जिससे वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को बना सकें। बंद कमरों में हुई इस बातचीत के सार्वजनिक हो जाने से इन दोनों ही नेताओं की ’ योग्यता‘ और सोच सामने आ गई है। इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलु यह है कि दोनों ही राजनेता भारत के दो प्रमुख दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी इन बातों का उनके दलों के नीति और सिद्धांतों से मेल नहीं खाते।
पहला प्रश्न तो गृह मंत्री चिदंबरम से यह ही है कि क्या वे मानते हैं कि भारत में विभाजन की अभी और भी संभावनाएं हैं? और दूसरा यह कि उनके लिए भारत का मतलब क्या है? और यह भी कि उनके लिए देश का कौनसा हिस्सा भारत है? और उत्तर और पूर्वोत्तर भारत को और वहां के मतदाताओं को वे क्या मानते हैं? और यदि वे भारत के वर्तमान सांगठनिक स्वरूप को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, तो फिर वे असम से राज्यसभा में आनेवाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रीमंडल में मंत्री ही क्यों हैं? और आखिर ऐसी कौनसी मजबूरी है, जिसके चलते उत्तर प्रदेश से चुनकर आनेवाले सोनिया गांधी और राहुल गांधी से निर्देशित हो रहे हैं? इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सरदार पटेल की विरासत एक ऐसा ’पढ़ा लिखा और विद्वान’ वकील संभाल रहा है, जिसको ना तो भारत की सांस्कृतिक विरासत की समझ है और ना ही उन्हें भारत की एकात्मता से ही कोई लेना देना है ।
क्या चिदंबरम को यह याद दिलाना पडे़गा कि दक्षिण भारत से ही आने वाले शंकर ने भारतवर्ष की संस्कृति, चेतना, और एकात्मता को देखते हुए पूरे भारत में चार शंकर पीठों की स्थापना कर वेदों को पुनर्स्थापित किया था, जिसके कारण उन्हैं आदिगुरू शंकराचार्य की उपाधि से विभूषित किया गया। क्या चिदंबरम को यह भी याद दिलाने की आवश्यकता है कि आज वे जिस मंत्रालय को संभाल रहे हैं, उस मंत्रालय को आजाद भारत में सरदार पटेल ने सबसे पहले संभाला था और उन्होंने अंग्रेजों की कूटनीति के उलट रियासतों में बंटे भारत को एक मजबूत गणतांत्रिक देश के रूप में विश्व पटल पर खड़ा कर दिया। बस एक ही जगह वे उस समय के चिदंबरम जैसे ’पढे़ लिखे और विद्वान’ राजनेता पं. जवाहर लाल नेहरू की बातों में आ गये और जम्मू कश्मीर रियासत के विलय का मामला उन्होंने पं. नेहरू पर छोड़ दिया।
और आज आजादी के 62 सालों के बाद भी जम्मू कश्मीर हमारे लिए एक समस्या बना हुआ है और अब तक हम उस पर एक लाख करोड़ रूपये से ज्यादा खर्च कर चुके हैं, इसके अलावा कितने ही सैनिक, जवान और नागरिक इसको भारत में बनाए रखने के लिए शहीद हुए हैं इसका जवाब गृहमंत्री श्री चिदंबरम के पास भी नहीं होगा।
चिदंबरम का यह विचार इसलिए भी भारत के प्रति देशद्रोह की श्रेणी में आता है कि जो व्यक्ति भारत के गृह मंत्री के रूप में काम कर रहा है, उसकी व्यक्तिगत सोच इस प्रकार की है। यह निर्णय कांग्रेस पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं को करना है कि वे चिदंबरम जैसे स्तरहीन और पृथकतावादी सोच के व्यक्ति को और कितने दिन तक ढ़ोते हैं। रहा, भारत की जनता का सवाल, वो तो चिदंबरम जैसे लोगों को चुनकर गलती कर चुकी है लेकिन वक्त आने पर इस गलती को वह सुधार भी सकती है।
दूसरी ओर राज्यसभा मे विपक्ष के नेता श्री अरूण जेतली हैं, जिन्होंने अपनी बातचीत में भारत की हिन्दू राष्ट्रवाद की चिंतन परंपरा को ही खारिज कर दिया है । क्या जेतली को यह याद दिलाने की जरूरत है कि भारतीय जनता पार्टी का जन्म ही हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांत और दोहरी सदस्यता के सवाल पर हुआ है। और क्या वे यह भी साबित करना चाहते हैं कि वे राष्ट्रवाद की राजनीति के ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जहां पर उनके बिना राष्ट्रवादी राजनीति एक कदम भी नहीं चल सकती। क्या अरूण जेतली यह कहने की ताकत रखते हैं कि वे अपने इस विचार पर मरते दम तक कायम हैं और इस मुद्दे पर होने वाले चुनावों में नगरपालिका चुनाव भी जीत सकते हैं, आम चुनावों की बात तो बहुत दूर की रही। अरूण जेतली का ’ज्ञान और विद्वता’ उनके पेशे के लिए भले ही सार्थक हो परन्तु राष्ट्रवादी राजनीति के लिए उनका यह ’ज्ञान’ मानसिक विक्षिप्तता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। जो लोग भारतीय जनता पार्टी की राजनीति करते हैं, उन्हैं बलराज मधोक का उदाहरण याद रखना चाहिये, जो लोकप्रियता के शिखर पर होने के बावजूद इसलिये हाशिये पर डाल दिये गए, क्योंकि उन्होंने अपने आप को जनसंघ द्वारा स्थापित राजनीतिक सिद्धांत से उपर मान लिया था।
भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम और राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली की अमरीकी राजनायिकों के साथ हुई बातचीत के खुलासे तो कम से कम यह ही साबित करते हैं कि देश की बागडोर ईमानदार राजनेताओं के हाथों में नहीं अपितु ऐसे नेताओं के हाथों में हैं, जो राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अपने देश के संविधान और कार्यकर्ताओं के अभिमान को किसी भी विदेशी ताकतों के आगे बेच सकते हैं। तो जब प्रश्न देश की अस्मिता का हो तो व्यक्ति का ज्ञान और विद्वता नहीं देखी जाती, सिर्फ यह देखा जाता है कि वह व्यक्ति अपने आप को देश के साथ कितना एकात्म कर पाया है और उसके मन में अपने देश और उसके संस्कारों के प्रति वो श्रद्धा है भी या नहीं जो प्राथमिक विद्यालय के प्रांगण में सिखाई जाती है।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।

Monday, December 6, 2010

क्यों नहीं बनाई जा रही जे पी सी

पिछले दिनों से देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में कोई काम काज नहीं हो रहा है। विपक्ष की मांग है कि 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जांच के लिये जे पी सी बनाई जाए। परन्तु सरकार विपक्ष की इस मांग के आगे झुकने के लिए तैयार ही नहीं है। पूरा विपक्ष और उच्चतम न्यायालय सरकार से न्यायसंगत निर्णय लेने की अपेक्षा कर रहे हैं लेकिन सरकार यह पता लगाने की इच्छुक ही नहीं दिखती कि क्या वाकई में 2 जी स्पैक्ट्रम के आवंटन में दूर संचार मंत्रालय के मंत्री और अधिकारियों ने भ्रष्ट आचरण कर देश को एक लाख पचहत्तर हजार करोड रूपये़ के राजस्व का नुकसान पहुँचाया है?
यह याद रखे जाने की जरूरत है कि कांग्रेस ने अपना लोकसभा चुनाव ‘ कांग्रेस का हाथ- आम आदमी के साथ’ का नारा देकर जीता था। लेकिन इसी आम आदमी के लिए काम आने वाला सरकारी खजाना लुट गया और सरकार अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए विपक्ष और उच्चतम न्यायालय के अलावा आम आदमी की पुकार को भी अनसुना कर रही है। तो यह क्यों नहीं माना चाहिये कि कांग्रेस नीत संप्रग सरकार अपने मतदाता और देश के प्रति जवाबदेही और उत्तर दायित्व से भाग रही है? क्या सरकार में बैठे लोगों को सत्ता सुख को बनाये रखने के लिए देश के भाग्य और उसके हालात के साथ खेलने की पूरी छूट मिलनी चाहिये या केन्द्र सरकार के लिए भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है।
विपक्ष द्वारा जे पी सी की मांग करना और उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रधानमंत्री से जवाब की अपेक्षा करना साधारण घटना नहीं है। इसका मतलब यह है कि विपक्ष और न्यायालय दोनों का ही संप्रग सरकार की प्रशासनिक व्यवस्थाओं से भरोसा उठ गया है। इसलिये वे अपनी ‘निगरानी’ में तथ्यों का पता लगाना चाहते हैं। मुख्य सर्तकता आयुक्त थॉमस को इस पूरी जांच प्रक्रिया से अलग रहने के लिए कहना भी सरकार की पारदर्शिता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।
ऐसा पहली बार नहीं है कि विपक्ष ने सयुंक्त संसदीय जांच दल की मांग उठाई है। सबसे पहले बोफोर्स तोप घोटाले की जांच करने की मांग को लेकर 6 अगस्त 1987 को पहली जे पी सी का गठन हुआ था। तब स्व0 राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। उसके बाद स्व0 नरसिंह राव के कार्यकाल में हुए हर्षद मेहता घोटाले की जांच के लिए 6 अगस्त 1992 को स्व0 रामनिवास मिर्धा के नेतृत्व जे पी सी का गठन हुआ। वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व काल में भी 26 अप्रेल 2001 को शेयर मार्केट घोटाले के लिए ले0 जनरल प्रकाश मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता में तीसरी जे पी सी बनी और 2003 में शरद पवार के नेतृत्व में पेय पदार्थों में कीटनाशक की मिलावट को लेकर पिछली संप्रग सरकार ने जे पी सी का गठन किया। तब भी श्री मनमोहन सिंह ही प्रधानमंत्री थे। लेकिन एक बोफोर्स वाले मामले के अलावा सरकार का इतना अडियल रूख कभी नहीं रहा। हालांकि ये सरकार पर है कि संयुक्त संसदीय जांच दल की रिपोर्ट और सलाह को माने या ना माने। क्योंकि यदि सरकार ने हर्षद मेहता और शेयर मार्केट घोटालों की रपटों और सुझावों पर ध्यान दिया होता तो 7 हजार करोड़ का सत्यम घोटाले को होने से रोका जा सकता था।
दरअसल, केन्द्र सरकार को नियंत्रित करने वाले नेता और दलाल इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि सरकार के अधीन चलने वाली किसी भी जांच एंजेसी को वे लोग प्रभावित करने की स्थिति में हैं। अतः 2 जी स्पैक्ट्रम की जांच में जिन नेताओं, दलालों, उद्योगपतियों और पत्रकारों की सांठ गांठ है उन्हैं और उनके भविष्य पर किसी प्रकार का संकट उपस्थित नहीं होगा, लेकिन यदि जे पी सी की मांग स्वीकारली जाती है तो आर्थिक घोटाले के इस पूरे तंत्र की बखिया उधेड़ी जा सकती है और कई ऐसे नाम भी सामने आ सकते हैं, जो अभी तक इस पूरे प्रकरण में पर्दे के पीछे हैं।
आश्चर्य तो तब होता है जब ईमानदारी, सज्जनता और सभ्यता की मिसाल माने जाने वाले प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह की बेचारगी सबके सामने आती है। देश पर जब भी आंतरिक या बाहरी संकट हो उस समय सक्षम और समर्थ नेतृत्व की जरूरत होती है, लेकिन इन राष्ट्रमंडल खेल हों या 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह एक कमजोर और लाचार प्रधानमंत्री साबित हुए हैं, जरूरत इस बात की है कि वे अपनी भूमिका में बदलाव लायें और निर्देश लेने की बजाय सरकार और पार्टी को निर्देशित करें।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।