क्या कोई भी निरपेक्ष और निष्पक्ष व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकवादी संगठन कह सकता है? क्या आतंकवादी संगठन वन्देमातरम् का गान करते हैं? या वे प्रतिदिन अपनी प्रार्थनाओं में ‘परम वैभव नैतुमेतत् स्वराष्ट्रं ’ का उद्घोष करते हैं? क्या समाज में रहने वाले करोड़ों स्वयंसेवकों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हित चिन्तकों को देखकर मन से आतंकवादी होने का भय उपजता है? क्या जो लोग निकर पहनकर और हाथ में डंडा लेकर शाखा जाते हैं, वे अपने ‘संघस्थान’ पर देश में सांप्रदायिक हमलों की रणनीति बनाते हैं? इन प्रश्नों का जवाब ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चाल, चरित्र और चेहरे को स्पष्ट कर देता है।
दरअसल, जो लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं , वे कभी भी संघ की विचार और व्यवहार धारा को समझ ही नहीं पाये। वे कभी यह नहीं जान पाये कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जनमानस में इतना आदर क्यों प्राप्त है? वे तो सिर्फ इतना समझ पाये हैं कि स्वतंत्र भारत में यह ही एकमात्र ऐसा संगठित संगठन है, जिसके एक आह्वान पर लाखों लोग अपना काम धाम छोड़कर चले आते हैं और यह ही वह ताकत है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरोधियों को डराती है। क्या किसी ने एक बार भी सोचा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध कौन लोग करते हैं? उनका राजनीतिक सोच और द्रष्टिकोण किन आधारों और विश्वसों पर आश्रित है? आखिर क्यों राजनीतिक दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझने की बजाय अपने मतदाताओं को भरमाते रहते हैं?
दरअसल, जब जब कांग्रेस की सत्ता होती है, तो उसके निशाने पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही रहता है, क्योंकी पूरी की पूरी राजनीतिक व्यवस्था यह मानती है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्राण देश भक्ति में ही बसते हैं और यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक संगठन से देश भक्ति की प्राण वायु को निकाल दिया जाए तो यह संगठन अपने आप ही निस्तेज और प्राणहीन हो जाएगा और एक बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्राणहीन कर दिया तो फिर देश के हितों और भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले राजनेताओं पर कोई लगाम ही नहीं रह जाएगी। इसीलिए हर मौके बेमौके पर संघ को बदनाम कर सकने वाली हर कोशिश करना राजनेता अपना पुनीत कर्तव्य समझते हैं।
अब जरा बात हो जाए अजमेर दरगाह ब्लास्ट के मामले की जांच की। याद कीजिए बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव। तब भी केन्द्र में यही सरकार थी और रेल मंत्री थे श्रीमान लालू प्रसाद यादव। उन्होंने मुस्लिम मतों को अपनी तरफ करने के लिए गोधरा कांड के लिए एक अलग से जांच आयोग गठित किया था, उस जांच आयोग की रिपोर्ट भी आ गई , परन्तु कार्यवाही आज तक नहीं हुई । लालू यादव और सोनिया गांधी अब गोधरा के बारे में बात ही नहीं करते। इसी प्रकार इस बार भी बिहार विधानसभा चुनाव का मौका है, जहां पर कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता उनको अगला प्रधानमंत्री घोषित करने से नहीं थक रहे हैं और जनमत जनता दल और भाजपा के पक्ष में जा रहा है, ऐसे में एक ही उपाय है, मुस्लिमों को पक्ष में करने के लिए संघ की बदनामी और इस बार बारी है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार की ।
अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामले में सत्ता की आंख देखकर कार्य करने वाली सरकारी व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में है। इस मामले में आरोपियों को पकड़ा जा चुका है, उनके खिलाफ चालान पेश हो रहे हैं और उन आरोपियों की पृष्ठभूमी के आधार पर जिस तरह से सरकारी अमला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने की साजिश रच रहा है, उससे सरकारी कार्य तंत्र की ही संदेह के घेरे में है।
सरकारी आरोप है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के सदस्य इन्द्रेश कुमार अजमेर दरगाह ब्लास्ट के षड़यंत्र में सहभागी हैं, इसके लिए उन्होंने जयपुर स्थित गुजराती समाज की धर्मशाला में एक भाषण भी दिया। आश्चर्य इस बात का है कि छोटे से छोटा अपराधी भी अपनी योजनाओं के बारे में किसी से कुछ नहीं कहता, लेकिन ए टी एस कहती है कि अजमेर दरगाह ब्लास्ट को अंजाम देने के लिए इन्द्रेश कुमार ने भाषण दिया।
इस पूरी कहानी में एक बार भी सरकारी पक्ष ने इन्द्रेश कुमार से बात नहीं की, उन्होंने अपने भाषण में क्या कहा, वह नहीं बताया और वह भाषण किस संस्था के कार्यक्रम में दिया गया और उसमें कौन कौन लोग उपस्थित थे, यह भी ए टी एस को नहीं पता? तो फिर यह क्यों नहीं माना जाए कि सरकारी एंजेसियां सत्ता में बैठे लोगों की आंख देख कर अपने कर्तव्यों को पूरा कर रही हैं।
ध्यान देने लायक तथ्य यह भी है कि जिस इन्द्रेश कुमार ने इतना बड़ा षड़यंत्र रचा, उसके खिलाफ पूरी सरकार ने अभियोग पत्र भी प्रस्तुत करने की मेहनत तक नहीं की, और ना ही इतने ‘खतरनाक मास्टर माइंड’ को 2007 से लेकर चालान पेश किये जाने तक गिरफ्तार कर पूछताछ की गई । यह तो सारा मामला ही राजनीतिक अव्यवस्था का घटिया नमूना है।
जांच तो इस बात की भी की जानी चाहिये कि जिस व्यक्ति के खिलाफ अभियोग पत्र भी नहीं बन पाया, उस व्यक्ति और संस्था को मीडिया के जरिये किसने और क्यों बदनाम करने की साजिश रची ? पूरी दुनिया में तब तक किसी को अपराधी नहीं माना जाता जब तक अदालत में उस व्यक्ति का दोष सिद्ध नहीं हो जाए, लेकिन इस मामले में तो अदालत में चालान पेश करने से पूर्व ही इन्द्रेश कुमार का नाम कांग्रेस के नेता ले रहे थे।
यह भी महत्त्वपूर्ण है कि अजमेर दरगाह ब्लास्ट का चालान पेश होने से पूर्व सोनिया गाँधी के विश्वस्त महासचिव दिग्विजय सिंह अकारण और असंदर्भित बयान जारी कर कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पाकिस्तानी खुफिया एंजेसी आई एस आई से मदद मिलती है। उसके बाद सोनिया पुत्र राहुल गांधी अपने ‘विवेक’ से मत व्यक्त करते हैं कि उनके लिए संघ और सिमी में कोई अन्तर नहीं है। उसके बाद सोनिया गांधी के ही एक कृपा पात्र अशोक गहलोत की सरकारी आंख देखकर अजमेर दरगाह ब्लास्ट में संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश कुमार का चार्जशीट में नामोल्लेख किया जाता है । क्या इन सभी बातों का एक ही क्रम में होना महज एक संयोग है या पूरी कांग्रेस बिहार में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के खिलाफ माहौल बना रही है, जिससे मुसलमानों को अपने पक्ष में किया जा सके।
दरअसल, यह समझे जाने की जरूरत है कि जब जब कांग्रेसी सत्ता ने सरकारी तंत्र के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित करने, बदनाम करने की कोशिश की है, तब तब यह संगठन और ताकतवर होकर सामने आया है। समझना कांग्रेस को है कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ताकत प्रदान करना चाहती है या देशभक्तों के इस सैलाब को रोकना चाहती है, यदि कांग्रेस के नेताओं की दिलचस्पी वास्तव में संघ को समाप्त करने में है, तो उन्हैं वह राष्ट्रवादी स्वरूप अंगीकार करना होगा जो तिलक, मालवीय, गांधी, सरदार पटेल, गोखल और सुभाष चंद्र बोस के मनों में बसती थी।
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
लेखक सेण्टर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।
Sunday, October 24, 2010
Saturday, September 18, 2010
क्यों जरूरी है राम मंदिर ?
रामजन्मभूमि पर फैसला आने को है, पर यह अंतिम फैसला नहीं है। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के जफरयाब जिलानी ने पिछले दिनों एक बयान में कहा भी है कि अंतिम अदालत का अंतिम फैसला ही मान्य होगा। यानि जो भी पक्ष माननीय उच्च न्यायालय के फैसले से सहमत नहीं हो, वह अगली अदालत का द्वार खटखटा सकता है। अंतिम अदालत का फैसला भी मनमाफिक नहीं आया तो संसद के पास यह अधिकार सुरक्षित है कि वह कानून द्वारा अंतिम अदालत के अंतिम फैसले को पलट सके। ऐसा शाहबानो केस में हमने देखा ही है।
विश्व हिन्दू परिषद की मांग है कि रामजन्मभूमि - बाबरी मस्जिद विवाद का निर्णय अदालतें नहीं कर सकती, इसका समाधान लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद में ही संभव है, जहां पर जनता द्वारा जनता के लिए चुने हुए प्रतिनिधि ही बैठते हैं। परन्तु क्या वे प्रतिनिधि जो आलू - प्याज के भाव, गरीबी, बेरोजगारी, झौंपड़ पटटी के वोट बैंक और विकास के नाम पर वोट मांगकर संसद तक पहुंचते हैं, वे आजाद भारत के इस सर्वाधिक संवेदनशील मुद्दे पर गंभीर हैं ?
6 दिसम्बर 1992 को क्रुद्ध कारसेवकों ने बाबरी ढ़ांचे को ध्वस्त कर दिया। उसके बाद से 17 साल बीत गये, लेकिन इन ‘प्रतिनिधियों’ ने इस विवाद का समाधान करने की दिशा में एक कदम की भी प्रगति नहीं की। सरकार ने मामला अदालत को सौंप दिया और निश्चिन्त हो गई । आजाद भारत में न्यायपालिका का जितना क्षरण कार्यपालिका और विधायिका ने किया है, उसके कारण न्यायपालिका पर जनता का विश्वास ही समाप्त हो चला है। ना तो न्यायपालिका और ना ही जनता, को यह विश्वास है कि न्यायपालिका जिस भी नतीजे पर पहुंचेगी ‘सत्ता’ उस निर्णय को मान ही लेगी और भारत में कानून के शासन को स्थापित किया जा सकेगा। दरअसल, आज तक सरकारों ने किसी भी मामले को अदालत में सौंपकर ‘विवाद को टालो और राज करो’ की नीति को ही विवादों से बचने का नुस्खा अपना रखा है, यही स्वतंत्र भारत के राजनेताओं का आजमाया हुआ पुराना पैंतरा है।
सत्ता, चाहे किसी भी दल की ही क्यों ना हो, वह सिर्फ ‘सरकार’ होती है और पांच साल में बदल जाने वाली सत्ता को स्थिर बनाये रखने के लिए हर ‘सरकार’ किसी भी नये नारे और नीति पर आश्रित होती है। चाहे वह 25 जून 1975 को लागू किया गया आपातकाल हो या ‘इंडिया शाइनिंग’। दोनों का ही हश्र एक सा ही है, जनता ने दोनों को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। दुर्भाग्य से वर्तमान केन्द्र सरकार भी अपने पूर्ववर्ती सरकारों का ही अनुसरण कर रही है। जो हश्र उनका हुआ, उससे अलग इस सरकार का भी परिणाम नहीं रहने वाला है। लेकिन जब तक सत्ता हाथ में है, ये ‘सरकार’ कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है क्योंकि संसद में सहमति के लिए खड़े होने वाले आधे से ज्यादा हाथ इसी सरकार के साथ हैं, और जब हाथ से ही काम चलता है तो विवेक की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।
अयोध्या में राम जन्म स्थान पर मंदिर बनाये जाने के विरोधियों के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं कि आजादी मिलने के 62 बरस बाद भी देश की बहुसंख्य जनता को विकास की बजाय मंदिर - मस्जिद के मसले में क्यों उलझना चाहिये ? जिस देश में एक तिहाई से अधिक आबादी गरीबी, भुखमरी, और बेरोजगारी से त्रस्त हो क्या वहां के जनसंगठनों और नागरिकों को यह शोभा देता है कि वे भारत के विकास के मार्ग को अवरूद्ध कर मंदिर - मस्जिद के लिए आपसी सौहार्द को बिगाडें और विश्व में तेजी से उभरती हुई आर्थिक ताकत को अपने ही हाथों से कमजोर करें ? निश्चित ही यह प्रश्न छोटे नहीं है, परन्तु जो लोग इस तरह के जुमले कसकर अयोध्या में राम जन्मस्थान पर मंदिर बनाये जाने का विरोध कर रहे हैं, उन्हैं भी एक छोटे से प्रश्न का जवाब देना ही चाहिये कि बिना स्वाभिमान और आत्मगौरव जागृति के यह आर्थिक तरक्की कितने दिन टिक पायेगी ? क्या हम ऐसा भारत चाहते हैं जो आक्रांताओं के स्मारकों को संरक्षण प्रदान करे और भारत को स्वतंत्र देखने की चाह में हंसते हंसते फांसी पर झूल जाने वाले भगतसिंह को आतंकवादी कहे।
जो लोग अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का विरोध कर रहे हैं, उन्हैं इस बात को तो समझना ही होगा कि भारत में राम के लिए मंदिर बनाने वाले लोगों और जगहों की कोई कमी नहीं है, लेकिन यह बात देश की रीति नीति और अंतरात्मा की है। प्रश्न यह भी है कि हम हमारी संस्कृति, सभ्यता और विरासत को नष्ट करने वाले हमलावरों को नकारने की हिम्मत रखते हैं या नहीं ? क्यों नहीं सारे राजनेता मिलकर इस सच्चाई को सामने रखते कि मात्र 300 मुगलों ने तोप और गाय को आगे रखकर भारत की साँस्कृतिक चेतना को कुचलने का अपराध किया था, आज जो पाकिस्तान और बंगलादेश सहित भारत में मुस्लिम दिखाई पड़ते हैं वे इन हमलावरों के आने से पहले इसी आर्यावर्त की महान संतानों के वंशज हैं। क्यों नहीं पूरे देश को यह बताया जाता कि जब जिन्ना के सामने घुटने टेकते हुए हमने भारत के विभाजन को स्वीकार किया था और मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान का गठन किया था, तो भारत में रहने वाले मुस्लिमों ने पंडों, भाटों, रावों और अन्य वंशलेखकों के पास जाकर अपनी जडें खोजने और अपने गौत्र निकालने के प्रयास शुरू कर दिये थे। आखिर पूरे देश को यह क्यों नहीं बताया जाता कि भारत में उस समय रहने वाला एक एक मुसलमान चीख चीख कर कह रहा था कि हम हिन्दुओं की संतान हैं और हमारी उपासना पद्धति इस्लामिक है।
पूरे विश्व में भारत ही तो है जो सभी उपासना पद्धतियों को फलने फूलने का अवसर प्रदान करता है। जहां शैव, शाक्त, जैन, बुद्ध, सिख, पारसी समुदाय के लोग अपनी विभिन्न उपासना पद्धतियों के साथ इस देश में स्वाभिमान के साथ रह सकते हैं तो फिर वे कौन लोग थे जिन्होंने इस उपासना पद्धति को मजहब में बदलने का अपराध किया ? आखिर देश को यह जानने का अधिकार तो है कि 1947 में मृत हो चुकी मुस्लिम लीग इस देश में किन राजनेताओं की सत्ता पिपासा के कारण पुन: उठ खड़ी हुई ?
देश को यह भी जानना है कि किन हालातों में लोग ‘मेहतर’ बनाए गए। जिन शासकों ने इस देश के नागरिकों से मैला उठवाया, हजारों हजार नागरिकों का कत्लेआम कर दिया, अपनी हवस को पूरा करने के लिए हरम बनवाए, क्या वे हमलावर नहीं थे। क्या भारत में उन हमलावरों के नाम पर दिल्ली में बड़ी बड़ी सड़के नहीं हैं ? भारत में जिलों के नाम उन पर नहीं हैं ? उन हमलावरों की बर्बरता का सजीव चित्रण करती हुई मस्जिदें भारत की सांझी विरासत कैसे हो सकती हैं ? प्रश्न यह है क्या कोई शासक अपनी ही प्रजा पर इस तरह के जुल्म करता है? इस तरह के जुल्म तो हमलावर शासक करते हैं, जिनकी इच्छा होती है कि आम जनता उनकी बर्बता से घबराकर उनकी शरणागति स्वीकार कर ले और अपनी जान बचाने के लिए उन्हीं के पंथ और मजहब को स्वीकार कर ले।
तो क्या यह माना जाए कि आजाद भारत की सरकारें अपनी संतानों को यह बताना चाहती हैं कि जिन हमलावरों ने हमारी अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया, हमारे पूर्वजों को लूटा, उनकी हत्याएं कर दीं, हम उन हमलावरों को हमारी विरासत के नाम पर उदारमना होकर स्वीकार करें। हमारी संताने उन हमलावरों को कैसे संरक्षण दे सकती हैं ? राजनेताओं की जरूरत वोट है, और उसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, हमलावरों को पूज भी सकते हैं। लेकिन यह तय भारत की जनता को करना है कि वह इन हमलावरों को अपनी ‘विरासत’ माने या नहीं। बात सिर्फ अयोध्या में राम मंदिर बनाने की जिद की नहीं है, बात यह है कि हम आजादी के बाद से लेकर आज तक अपने देश की दशा और दिशा तय नहीं कर पाये। तो जो काम हमारे राजनेता नहीं कर पाये उसे ‘रामजी’ को ही पूरा करना पडेगा।
विश्व हिन्दू परिषद की मांग है कि रामजन्मभूमि - बाबरी मस्जिद विवाद का निर्णय अदालतें नहीं कर सकती, इसका समाधान लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद में ही संभव है, जहां पर जनता द्वारा जनता के लिए चुने हुए प्रतिनिधि ही बैठते हैं। परन्तु क्या वे प्रतिनिधि जो आलू - प्याज के भाव, गरीबी, बेरोजगारी, झौंपड़ पटटी के वोट बैंक और विकास के नाम पर वोट मांगकर संसद तक पहुंचते हैं, वे आजाद भारत के इस सर्वाधिक संवेदनशील मुद्दे पर गंभीर हैं ?
6 दिसम्बर 1992 को क्रुद्ध कारसेवकों ने बाबरी ढ़ांचे को ध्वस्त कर दिया। उसके बाद से 17 साल बीत गये, लेकिन इन ‘प्रतिनिधियों’ ने इस विवाद का समाधान करने की दिशा में एक कदम की भी प्रगति नहीं की। सरकार ने मामला अदालत को सौंप दिया और निश्चिन्त हो गई । आजाद भारत में न्यायपालिका का जितना क्षरण कार्यपालिका और विधायिका ने किया है, उसके कारण न्यायपालिका पर जनता का विश्वास ही समाप्त हो चला है। ना तो न्यायपालिका और ना ही जनता, को यह विश्वास है कि न्यायपालिका जिस भी नतीजे पर पहुंचेगी ‘सत्ता’ उस निर्णय को मान ही लेगी और भारत में कानून के शासन को स्थापित किया जा सकेगा। दरअसल, आज तक सरकारों ने किसी भी मामले को अदालत में सौंपकर ‘विवाद को टालो और राज करो’ की नीति को ही विवादों से बचने का नुस्खा अपना रखा है, यही स्वतंत्र भारत के राजनेताओं का आजमाया हुआ पुराना पैंतरा है।
सत्ता, चाहे किसी भी दल की ही क्यों ना हो, वह सिर्फ ‘सरकार’ होती है और पांच साल में बदल जाने वाली सत्ता को स्थिर बनाये रखने के लिए हर ‘सरकार’ किसी भी नये नारे और नीति पर आश्रित होती है। चाहे वह 25 जून 1975 को लागू किया गया आपातकाल हो या ‘इंडिया शाइनिंग’। दोनों का ही हश्र एक सा ही है, जनता ने दोनों को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। दुर्भाग्य से वर्तमान केन्द्र सरकार भी अपने पूर्ववर्ती सरकारों का ही अनुसरण कर रही है। जो हश्र उनका हुआ, उससे अलग इस सरकार का भी परिणाम नहीं रहने वाला है। लेकिन जब तक सत्ता हाथ में है, ये ‘सरकार’ कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है क्योंकि संसद में सहमति के लिए खड़े होने वाले आधे से ज्यादा हाथ इसी सरकार के साथ हैं, और जब हाथ से ही काम चलता है तो विवेक की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।
अयोध्या में राम जन्म स्थान पर मंदिर बनाये जाने के विरोधियों के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं कि आजादी मिलने के 62 बरस बाद भी देश की बहुसंख्य जनता को विकास की बजाय मंदिर - मस्जिद के मसले में क्यों उलझना चाहिये ? जिस देश में एक तिहाई से अधिक आबादी गरीबी, भुखमरी, और बेरोजगारी से त्रस्त हो क्या वहां के जनसंगठनों और नागरिकों को यह शोभा देता है कि वे भारत के विकास के मार्ग को अवरूद्ध कर मंदिर - मस्जिद के लिए आपसी सौहार्द को बिगाडें और विश्व में तेजी से उभरती हुई आर्थिक ताकत को अपने ही हाथों से कमजोर करें ? निश्चित ही यह प्रश्न छोटे नहीं है, परन्तु जो लोग इस तरह के जुमले कसकर अयोध्या में राम जन्मस्थान पर मंदिर बनाये जाने का विरोध कर रहे हैं, उन्हैं भी एक छोटे से प्रश्न का जवाब देना ही चाहिये कि बिना स्वाभिमान और आत्मगौरव जागृति के यह आर्थिक तरक्की कितने दिन टिक पायेगी ? क्या हम ऐसा भारत चाहते हैं जो आक्रांताओं के स्मारकों को संरक्षण प्रदान करे और भारत को स्वतंत्र देखने की चाह में हंसते हंसते फांसी पर झूल जाने वाले भगतसिंह को आतंकवादी कहे।
जो लोग अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का विरोध कर रहे हैं, उन्हैं इस बात को तो समझना ही होगा कि भारत में राम के लिए मंदिर बनाने वाले लोगों और जगहों की कोई कमी नहीं है, लेकिन यह बात देश की रीति नीति और अंतरात्मा की है। प्रश्न यह भी है कि हम हमारी संस्कृति, सभ्यता और विरासत को नष्ट करने वाले हमलावरों को नकारने की हिम्मत रखते हैं या नहीं ? क्यों नहीं सारे राजनेता मिलकर इस सच्चाई को सामने रखते कि मात्र 300 मुगलों ने तोप और गाय को आगे रखकर भारत की साँस्कृतिक चेतना को कुचलने का अपराध किया था, आज जो पाकिस्तान और बंगलादेश सहित भारत में मुस्लिम दिखाई पड़ते हैं वे इन हमलावरों के आने से पहले इसी आर्यावर्त की महान संतानों के वंशज हैं। क्यों नहीं पूरे देश को यह बताया जाता कि जब जिन्ना के सामने घुटने टेकते हुए हमने भारत के विभाजन को स्वीकार किया था और मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान का गठन किया था, तो भारत में रहने वाले मुस्लिमों ने पंडों, भाटों, रावों और अन्य वंशलेखकों के पास जाकर अपनी जडें खोजने और अपने गौत्र निकालने के प्रयास शुरू कर दिये थे। आखिर पूरे देश को यह क्यों नहीं बताया जाता कि भारत में उस समय रहने वाला एक एक मुसलमान चीख चीख कर कह रहा था कि हम हिन्दुओं की संतान हैं और हमारी उपासना पद्धति इस्लामिक है।
पूरे विश्व में भारत ही तो है जो सभी उपासना पद्धतियों को फलने फूलने का अवसर प्रदान करता है। जहां शैव, शाक्त, जैन, बुद्ध, सिख, पारसी समुदाय के लोग अपनी विभिन्न उपासना पद्धतियों के साथ इस देश में स्वाभिमान के साथ रह सकते हैं तो फिर वे कौन लोग थे जिन्होंने इस उपासना पद्धति को मजहब में बदलने का अपराध किया ? आखिर देश को यह जानने का अधिकार तो है कि 1947 में मृत हो चुकी मुस्लिम लीग इस देश में किन राजनेताओं की सत्ता पिपासा के कारण पुन: उठ खड़ी हुई ?
देश को यह भी जानना है कि किन हालातों में लोग ‘मेहतर’ बनाए गए। जिन शासकों ने इस देश के नागरिकों से मैला उठवाया, हजारों हजार नागरिकों का कत्लेआम कर दिया, अपनी हवस को पूरा करने के लिए हरम बनवाए, क्या वे हमलावर नहीं थे। क्या भारत में उन हमलावरों के नाम पर दिल्ली में बड़ी बड़ी सड़के नहीं हैं ? भारत में जिलों के नाम उन पर नहीं हैं ? उन हमलावरों की बर्बरता का सजीव चित्रण करती हुई मस्जिदें भारत की सांझी विरासत कैसे हो सकती हैं ? प्रश्न यह है क्या कोई शासक अपनी ही प्रजा पर इस तरह के जुल्म करता है? इस तरह के जुल्म तो हमलावर शासक करते हैं, जिनकी इच्छा होती है कि आम जनता उनकी बर्बता से घबराकर उनकी शरणागति स्वीकार कर ले और अपनी जान बचाने के लिए उन्हीं के पंथ और मजहब को स्वीकार कर ले।
तो क्या यह माना जाए कि आजाद भारत की सरकारें अपनी संतानों को यह बताना चाहती हैं कि जिन हमलावरों ने हमारी अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया, हमारे पूर्वजों को लूटा, उनकी हत्याएं कर दीं, हम उन हमलावरों को हमारी विरासत के नाम पर उदारमना होकर स्वीकार करें। हमारी संताने उन हमलावरों को कैसे संरक्षण दे सकती हैं ? राजनेताओं की जरूरत वोट है, और उसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, हमलावरों को पूज भी सकते हैं। लेकिन यह तय भारत की जनता को करना है कि वह इन हमलावरों को अपनी ‘विरासत’ माने या नहीं। बात सिर्फ अयोध्या में राम मंदिर बनाने की जिद की नहीं है, बात यह है कि हम आजादी के बाद से लेकर आज तक अपने देश की दशा और दिशा तय नहीं कर पाये। तो जो काम हमारे राजनेता नहीं कर पाये उसे ‘रामजी’ को ही पूरा करना पडेगा।
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Thursday, August 26, 2010
भगवा आंतकवाद के बहाने ......
भारत में भगवा आतंकवाद है, यह खोज भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं अपितु श्री पी. चिदम्बरम ने की है और यह भी कि श्री चिदंबरम सिर्फ वकील ही नहीं हैं अपितु भारत सरकार के गृह मंत्री भी हैं, और सबसे बड़ी बात यह है कि श्री चिदंबरम ने यह खुलासा किसी प्रश्न के जवाब में नहीं किया, अपितु देश भर के राज्य पुलिस प्रमुखों के दो दिवसीय सम्मेलन में किया है। भगवा आंतकवाद पर तो चर्चा तो बाद में करेंगें लेकिन यह जानना जरूरी है कि क्या भारत के गृहमंत्री पुलिस अधिकारियों के गले यह बात उतारने की कोशिश कर रहे हैं कि अब पुलिस अधिकारी ‘भगवा’ बात करने वाले लोगों को आतंकवादी के रूप में देखने की कोशिश शुरू कर दें। इसी से जुड़ा हुआ दूसरा प्रश्न है कि भगवा आतंकवाद को अस्तित्व में लाकर वे अपना कौनसा राजनीतिक ऐजेंडा पूरा कर रहे हैं या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किस को खुश कर रहे हैं?
प्रश्न यह उठता है कि भारत में भगवा आतंकवाद की बात क्यों और कहां से शुरू हुई ? दरअसल इस प्रश्न की जड़ में एक मूल प्रश्न है कि ‘हर आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होता है?’ जब देश की जनता ने संसद पर और मुंबई में हुए आतंकी हमले में अफजल गुरू और कसाब का नाम आने के बाद और अदालत द्वारा उन्हैं दोषी पाए जाने के बाद यह प्रश्न पूछना शुरू किया तो इस प्रश्न का जवाब देश के मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम समाज ने देने की बजाय, देश की सद्भावना बनाए रखने वाले सर्वस्पर्शी दल कांग्रेस की गठबंधन सरकार ने देना उचित समझा। मालेगांव विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और दया शंकर पाण्डेय का नाम आने के बाद तो अंधे के हाथ बटेर लग गई । पूरी सरकार और उसके सहयोगी दल यह सिद्ध करने में लग गये कि ‘आतंकवादी सिर्फ मुसलमान ही नहीं होता, हिन्दू भी होता है।’ अपनी इस दलील को पुष्ट करने के लिए सरकार ने दो और प्रकरणों को जनता के सामने रखा इनमें एक गोवा में सनातन संस्था से जुडे लोगों का कारनामा है और दूसरा दिनेश गुप्ता का। कहा जा रहा है कि भगवा मानसिकता के लोग देश की आंतरिक सुरक्षा और सद्भावना को बिगाड़ने में लगे हुए हैं।
श्री चिदंबरम से एक छोटा सा सवाल है कि वे जिस भगवा आतंकवाद की बात कर रहे हैं उसका मतलब क्या है? क्या वे भारत में सनातन काल से चली आ रही संत परम्परा को आतंकवाद से जोड़ रहे हैं? या फिर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडे संगठनों और कार्यकर्त्ताओं को आतंकवादी कह रहे हैं ? या फिर वे ये कहना चाहते हैं कि भारत में मंदिर जाने वाले हर व्यिक्त से भारत की एकता और अखंड़ता को खतरा है ? या उनको लगता है कि देश में पनप रहे मुस्लिम आतंकवाद, नक्सली आतंकवाद का जवाब देने की बजाय ‘भगवा आतंकवाद’ की बात को स्थापित करना उनके तथा उनकी सर्वस्पर्शी पार्टी के राजनीतिक हित में है। श्री चिंदम्बरम शायद यह भूल गये हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी लगभग हर सभा में यह पूछते नजर आते थे कि आज की सभा में कितने मुस्लिम भाई आए हैं? वे कहते थे कि भारत की आजादी की जितनी जरूरत हिन्दुओं को है, उतनी ही यह मुस्लिमों के लिए भी आवश्यक है, अत: हर हिन्दू भाई का कर्तव्य है कि वह अपने साथ एक मुस्लिम भाई को अवश्य ही लेकर आए। लेकिन कितने मुसलमान महात्मा गांधी के साथ आए? उस समय भी मुसलमान महात्मा गांधी की अपील को इसलिए अनसुना कर देते थे, क्योंकि उनका यह विश्वास था कि कांग्रेस हिन्दू नेताओं की पार्टी है, उसमें मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। देश का बंटवारा कर देने के बाद भी क्या मुसलमानों का यह चरित्र बदला ? क्या आज भी मुसलमान कांग्रेस को अपना मानते हैं? वे अपने फायदे और नुकसान का आकलन करते हैं। गुजरात में वे कांग्रेस के साथ हैं तो बिहार में नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और उत्तर प्रदेश में कभी मुलायम सिंह के साथ तो कभी मायावती के साथ। इसी प्रकार हर राज्य में उनकी अपनी गणित है। इस गणित को महात्मा गांधी और नेहरू जैसे कद्दावर नेता नहीं समझ पाये तो वर्तमान कांग्रेसी नेतृत्व तो उनके मुकाबले काफी बौना है।
दरअसल, वोट की राजनीति और तुष्टीकरण की नीति के चलते केंद्र सरकार इतना नीचे गिर चुकी है कि इस देश को ‘मां’ मानने वाले और किसी व्यक्ति की बजाय भगवा ध्वज को ही आराध्य मानने वाले करोड़ों भारतीयों को भगवा आतंकवादी कहने में गर्व महसूस कर रही है। यदि केंद्र सरकार के पास ‘भगवा आतंकवाद’ के इतने पुख्ता सबूत हैं तो वह इन भगवा संस्थाओं पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती है? क्यों साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और दयाशकर पाण्डेय जैसे ‘आतंकवादियों’ के खिलाफ सक्रयिता दिखाकर अदालत से उन्हैं फांसी की सजा दिलवाती? और पाकिस्तान के साथ बातचीत में यह स्वीकार करती कि अफजल गुरू और कसाब पाकिस्तान के इशारे पर नहीं अपितु ‘भगवाधारियों’ के इशारे पर भारत की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने आए थे।
हमारी सबसे बड़ी समस्या ही यह है कि हमारा शासक वर्ग अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है। चाहे उसे विदेशी आंक्राताओं के सम्मान में कालीन बिछाने का काम मिले, या फिर अपनी ही मातृभूमि के साथ गद्दारी करनी पडे, उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता अपनी सत्ता को बचाए रखना है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत का क्षैत्र इरान (आर्यन ), अफगानिस्तान (उपगणस्थान)से लेकर इंडोनेसिया तक था, आज यदि हमको भारत कश्मीर से कन्याकुमारी तक ही दिखता है, तो इसका कारण यहां के नागरिक नहीं अपितु शासक हैं, जिनके बाजुओं में विद्रोहियों से निपटने की ताकत ही नहीं थी और ना ही वह दृष्टि थी जिसके आधार पर वे दुश्मन और उसकी नीयत को पहचान पाते। आज भी कश्मीर में भाडे के टट्टू हमारे जवानों पर पत्थर फैंक कर आजाद कश्मीर के सपने को हकीकत में बदलने की कसमें खा रहे हैं और हमारी ही कृपा पर पलने वाला नेपाल जैसा पिद्दी सा देश हमारे ही खिलाफ चीन और पाकिस्तान का साथ दे रहा है।
श्री चिदम्बरम उन्हीं शासकों की श्रृंखला की निचली पायदान का मोहरा भर हैं, जिनसे दुश्मनों के हौंसले तो पस्त किये नहीं जाते, लेकिन दिल्ली के वातानुकूलित भवनों में बैठकर ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्यौरी को पुष्ट करने के लिए उनके पास पर्याप्त समय है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जिन्हैं आप आतंकवादी साबित करने की धमकी दे रहे हैं, उन्हैं इस देश पर मर मिटने के लिए किसी शासक के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं होती। ये वे करोड़ों लोग हैं, जो सिर्फ एक ही आशा के साथ ‘भगवा ध्वज’ को प्रणाम करते हैं कि एक सुबह ऐसी होगी, जब भारत विश्व का सिरमौर होगा, भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए दोनों समय का भोजन, पहनने को वस्त्र और अर्जन करने के लिए ज्ञान होगा। हर किसान को काम होगा। भारत में रहने वाले वनवासियों को नक्सली और सरकारी गोलियों का निशाना नहीं बनाया जाएगा। उनकी खूबसूरत दुनियां में वे सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी, जो श्री चिदंबरम को दिल्ली में उपलब्ध हैं।
प्रश्न यह उठता है कि भारत में भगवा आतंकवाद की बात क्यों और कहां से शुरू हुई ? दरअसल इस प्रश्न की जड़ में एक मूल प्रश्न है कि ‘हर आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होता है?’ जब देश की जनता ने संसद पर और मुंबई में हुए आतंकी हमले में अफजल गुरू और कसाब का नाम आने के बाद और अदालत द्वारा उन्हैं दोषी पाए जाने के बाद यह प्रश्न पूछना शुरू किया तो इस प्रश्न का जवाब देश के मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम समाज ने देने की बजाय, देश की सद्भावना बनाए रखने वाले सर्वस्पर्शी दल कांग्रेस की गठबंधन सरकार ने देना उचित समझा। मालेगांव विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और दया शंकर पाण्डेय का नाम आने के बाद तो अंधे के हाथ बटेर लग गई । पूरी सरकार और उसके सहयोगी दल यह सिद्ध करने में लग गये कि ‘आतंकवादी सिर्फ मुसलमान ही नहीं होता, हिन्दू भी होता है।’ अपनी इस दलील को पुष्ट करने के लिए सरकार ने दो और प्रकरणों को जनता के सामने रखा इनमें एक गोवा में सनातन संस्था से जुडे लोगों का कारनामा है और दूसरा दिनेश गुप्ता का। कहा जा रहा है कि भगवा मानसिकता के लोग देश की आंतरिक सुरक्षा और सद्भावना को बिगाड़ने में लगे हुए हैं।
श्री चिदंबरम से एक छोटा सा सवाल है कि वे जिस भगवा आतंकवाद की बात कर रहे हैं उसका मतलब क्या है? क्या वे भारत में सनातन काल से चली आ रही संत परम्परा को आतंकवाद से जोड़ रहे हैं? या फिर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडे संगठनों और कार्यकर्त्ताओं को आतंकवादी कह रहे हैं ? या फिर वे ये कहना चाहते हैं कि भारत में मंदिर जाने वाले हर व्यिक्त से भारत की एकता और अखंड़ता को खतरा है ? या उनको लगता है कि देश में पनप रहे मुस्लिम आतंकवाद, नक्सली आतंकवाद का जवाब देने की बजाय ‘भगवा आतंकवाद’ की बात को स्थापित करना उनके तथा उनकी सर्वस्पर्शी पार्टी के राजनीतिक हित में है। श्री चिंदम्बरम शायद यह भूल गये हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी लगभग हर सभा में यह पूछते नजर आते थे कि आज की सभा में कितने मुस्लिम भाई आए हैं? वे कहते थे कि भारत की आजादी की जितनी जरूरत हिन्दुओं को है, उतनी ही यह मुस्लिमों के लिए भी आवश्यक है, अत: हर हिन्दू भाई का कर्तव्य है कि वह अपने साथ एक मुस्लिम भाई को अवश्य ही लेकर आए। लेकिन कितने मुसलमान महात्मा गांधी के साथ आए? उस समय भी मुसलमान महात्मा गांधी की अपील को इसलिए अनसुना कर देते थे, क्योंकि उनका यह विश्वास था कि कांग्रेस हिन्दू नेताओं की पार्टी है, उसमें मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। देश का बंटवारा कर देने के बाद भी क्या मुसलमानों का यह चरित्र बदला ? क्या आज भी मुसलमान कांग्रेस को अपना मानते हैं? वे अपने फायदे और नुकसान का आकलन करते हैं। गुजरात में वे कांग्रेस के साथ हैं तो बिहार में नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और उत्तर प्रदेश में कभी मुलायम सिंह के साथ तो कभी मायावती के साथ। इसी प्रकार हर राज्य में उनकी अपनी गणित है। इस गणित को महात्मा गांधी और नेहरू जैसे कद्दावर नेता नहीं समझ पाये तो वर्तमान कांग्रेसी नेतृत्व तो उनके मुकाबले काफी बौना है।
दरअसल, वोट की राजनीति और तुष्टीकरण की नीति के चलते केंद्र सरकार इतना नीचे गिर चुकी है कि इस देश को ‘मां’ मानने वाले और किसी व्यक्ति की बजाय भगवा ध्वज को ही आराध्य मानने वाले करोड़ों भारतीयों को भगवा आतंकवादी कहने में गर्व महसूस कर रही है। यदि केंद्र सरकार के पास ‘भगवा आतंकवाद’ के इतने पुख्ता सबूत हैं तो वह इन भगवा संस्थाओं पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती है? क्यों साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और दयाशकर पाण्डेय जैसे ‘आतंकवादियों’ के खिलाफ सक्रयिता दिखाकर अदालत से उन्हैं फांसी की सजा दिलवाती? और पाकिस्तान के साथ बातचीत में यह स्वीकार करती कि अफजल गुरू और कसाब पाकिस्तान के इशारे पर नहीं अपितु ‘भगवाधारियों’ के इशारे पर भारत की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने आए थे।
हमारी सबसे बड़ी समस्या ही यह है कि हमारा शासक वर्ग अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है। चाहे उसे विदेशी आंक्राताओं के सम्मान में कालीन बिछाने का काम मिले, या फिर अपनी ही मातृभूमि के साथ गद्दारी करनी पडे, उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता अपनी सत्ता को बचाए रखना है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत का क्षैत्र इरान (आर्यन ), अफगानिस्तान (उपगणस्थान)से लेकर इंडोनेसिया तक था, आज यदि हमको भारत कश्मीर से कन्याकुमारी तक ही दिखता है, तो इसका कारण यहां के नागरिक नहीं अपितु शासक हैं, जिनके बाजुओं में विद्रोहियों से निपटने की ताकत ही नहीं थी और ना ही वह दृष्टि थी जिसके आधार पर वे दुश्मन और उसकी नीयत को पहचान पाते। आज भी कश्मीर में भाडे के टट्टू हमारे जवानों पर पत्थर फैंक कर आजाद कश्मीर के सपने को हकीकत में बदलने की कसमें खा रहे हैं और हमारी ही कृपा पर पलने वाला नेपाल जैसा पिद्दी सा देश हमारे ही खिलाफ चीन और पाकिस्तान का साथ दे रहा है।
श्री चिदम्बरम उन्हीं शासकों की श्रृंखला की निचली पायदान का मोहरा भर हैं, जिनसे दुश्मनों के हौंसले तो पस्त किये नहीं जाते, लेकिन दिल्ली के वातानुकूलित भवनों में बैठकर ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्यौरी को पुष्ट करने के लिए उनके पास पर्याप्त समय है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जिन्हैं आप आतंकवादी साबित करने की धमकी दे रहे हैं, उन्हैं इस देश पर मर मिटने के लिए किसी शासक के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं होती। ये वे करोड़ों लोग हैं, जो सिर्फ एक ही आशा के साथ ‘भगवा ध्वज’ को प्रणाम करते हैं कि एक सुबह ऐसी होगी, जब भारत विश्व का सिरमौर होगा, भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए दोनों समय का भोजन, पहनने को वस्त्र और अर्जन करने के लिए ज्ञान होगा। हर किसान को काम होगा। भारत में रहने वाले वनवासियों को नक्सली और सरकारी गोलियों का निशाना नहीं बनाया जाएगा। उनकी खूबसूरत दुनियां में वे सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी, जो श्री चिदंबरम को दिल्ली में उपलब्ध हैं।
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